साधन-प्राश-३:अंतरिक्ष
साधन-प्राश-३
प्रश्नकर्ता- निमि
समाधानकर्ता- अंतरिक्ष
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परस्य विष्णोरीशस्य
"मायिनामपि मोहिनीम्"। मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु न:।।१।।
(अ०३/स्क०११)
विदेहराज निमि ने उन
योगीश्वरों से पूछा,
भगवन्! सर्वशक्तिमान
परमकारण भगवान् विष्णु की माया बड़े-बड़े मायावियों को भी मोहित कर देती है, अतः अब
मैं उस माया का स्वरुप जानना चाहता हूं।
तीसरे योगीश्वर अंतरिक्ष
जी ने कहा,
राजन्!
भगवान की माया स्वरुपत: निर्वचनीय है अतः माया के कार्यों के द्वारा ही
माया का निरुपण होता है।
(अ) सृष्टि
भगवान् अंतर्यामी रुप से
पंच महाभूतों के द्वारा
[[आकाश (Space) , वायु
(Quark), अग्नि (Energy), जल (Force) तथा पृथ्वी (Matter)]]
प्राणियों में प्रवेश करके,
सर्वप्रथम स्वयं को
मन के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। तत्पश्चात् पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच-कर्मेन्द्रिय
के रूप में प्रकट होकर, प्राणियों को विषयों का भोग कराने लगते हैं।
[[ पंच ज्ञानेंद्रियां-
आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा;
पंच कर्मेंद्रियां-
हाथ, पैर, मुंह, गुदा और लिंग
(और चार अंतःकरण-
मन, बुद्धि, चित्त
और अहंकार।)]]
-यह भगवान की माया
है।*
(ब)स्थिति
वह देहाभिमानी जीव,
अंतर्यामी के द्वारा प्रकाशित इंद्रियों के द्वारा विषयों का भोग करता है और इस पंचमहाभूतों
के द्वारा निर्मित शरीर को आत्मा-
(अपना स्वरूप) मानकर
उसी में आसक्त हो जाता है।
-यह भगवान की माया
है।*
अब वह कर्मेंद्रियों
से सकाम कर्म करता है और उसी के अनुसार-
शुभ कर्मों के फलस्वरूप
सुख और
अशुभ कर्मों के फलस्वरुप
दु:ख का भोग करने लगता है और बारम्बार शरीर धारण कर इस संसार में भटकने लगता है।
-यह भगवान की माया
है।*
इस प्रकार वह जीव,
ऐसे अनेक अमंगलकारी कर्मगतियां को और उनके फलों को प्राप्त होता है और पंचमहाभूतों
के प्रलयपर्यंत विवश होकर जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद पुनः जन्म को प्राप्त
होता रहता है...
-यह भगवान की माया
है।*
(स)प्रलय(संहार)
पंचभूतों के प्रलय
के समय काल- जो अनादि और अनंत है,
वह स्थूल एवं सूक्ष्म
में
द्रव्य एवं गुणरुप-
इस समस्त व्यक्त सृष्टि
को अव्यक्त (जो कि उसका मूल-कारण है) की ओर
खींचता है।
-यह भगवान की माया
है। उस समय पृथ्वी पर लगातार सौ वर्षों तक भयंकर सूखा पड़ता है, वर्षा बिलकुल भी नहीं
होती।
प्रलय काल की शक्ति
से सूर्य उष्णता और भी बढ़ जाती है। -यह भगवान की माया है। उस समय संकर्षण (शेषनाग)
के मुंह से आग की प्रचंड लपटें निकलती हैं और वायु की प्रेरणा से वे (क्रमशः) पाताल-लोक
से जलाना आरंभ करती हैं।
-यह भगवान की माया
है।
*
इसके पश्चात प्रलयकालीन
सांवर्तक मेघ (इनका उल्लेख भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला में हुआ है।) लगातार सौ
वर्षों तक,
पृथ्वी पर मूसलाधार जल बरसातें हैं, उससे यह विराट् ब्रह्माण्ड
जलमग्न हो जाता है।
-यह भगवान की माया
है। राजन्!
उस समय,
जैसे बिना ईंधन के
आग बुझ जाती है, वैसे ही विराट् पुरुष ब्रह्मा अपने ब्रह्माण्ड शरीर को छोड़कर सूक्ष्मस्वरुप-
"अव्यक्त" में लीन हो जाते हैं।
-यह भगवान की माया
है।
~वायु पृथ्वी की गंध
खींच लेती है, जिससे वह- जल के रूप में हो जाती है।
~जब वही वायु
जल के रस को खींच लेती
है तब वह जल अपना कारण- अग्नि बन जाता है।
-यह भगवान की माया
है। राजन्!
~जब अंधकार
अग्नि का रूप छीन लेता
है,
तब वह अग्नि वायु में
लीन हो जाती है।
राजन्!
~जब अवकाश रूप आकाश
वायु की स्पर्श-शक्ति छीन लेता है, तब वह आकाश में लीन हो जाता है।
-यह भगवान की माया
है।
~कालरूप ईश्वर, आकाश
के "शब्द-गुण" को हर लेता है जिससे वह-
तामस अहंकार में लीन हो जाता है।
~इंद्रियां और बुद्धि-
राजस अहंकार में लीन
होती हैं और
~मन, "सात्विक
अहंकार" से उत्पन्न देवताओं के साथ-साथ अहंकार में प्रवेश कर जाता है तथा
~अपने तीन प्रकार के
कार्यों के साथ अहंकार महत्तत्व में लीन हो जाता है।
~यह महत्-तत्व प्रकृति
में और प्रकृति ब्रह्म में लीन होती है।
~फिर इसी के विपरीत
क्रम से सृष्टि(आरंभ) होती है-
यह भगवान की माया है।
हे विदेहराज (निमि)!
यह सृष्टि, स्थिति
और संहार(प्रलय) करने वाली त्रिगुणमयी माया है।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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