साधन-प्राश-२:भगवद्भक्त(भागवत) के लक्षण
साधन-प्राश-२
प्रश्नकर्ता- निमि
समाधानकर्ता- हरि
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भगवद्भक्त(भागवत) के लक्षण
राजा ने निमि ने पूछा,
योगीश्वर!
अब आप कृपा करके भगवद्भक्त के लक्षण वर्णन कीजिये।
अथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मो यादृशो नृणाम्। यथा चरति यद् ब्रूते यैर्लिङ्गैर्भगवत्प्रिय:।।४४।।
(०२/११)
~उसके क्या धर्म हैं? और
~कैसा स्वभाव होता है?
~वह मनुष्यों के साथ व्यवहार करते समय कैसा आचरण करता है?
~क्या बोलता है? और
~किन "लक्षणों" के कारण भगवान का प्यारा होता है?
दृष्टव्य-
अर्जुन उवाच-
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। (श्रीमद्भगवद्गीता ५४/०२)
*
उन नौ योगीश्वरों में से
दूसरे हरि जी ने कहा,
हे राजन्!
आत्म स्वरूप भगवान् समस्त प्राणियों में आत्मा के रूप में अथवा नियंता के रूप में स्थित हैं।
जो मनुष्य कहीं भी कम या अधिक मात्रा में न देख कर, सर्वत्र परिपूर्ण भगवत-सत्ता को ही देखता है और
साथ ही साथ समस्त प्राणी और समस्त पदार्थ आत्म-स्वरूप भगवान में ही
आधेय(स्थापित)-रूप से अथवा अध्यस्त(आरोपित)-रूप से स्थित हैं,
_ऐसा अनुभव करता है,
उसे भगवान का परम-प्रेमी उत्तम भागवत समझना चाहिये।
उसकी दृष्टि, "सिद्ध की दृष्टि" है।
*
मध्यम कोटि का भागवत
वह है, जो-भगवान से प्रेम, भगवद्-भक्तों से मित्रता, दु:खी और अज्ञानीजन पर कृपा तथा भगवान से द्वेष करने वालों की उपेक्षा करता है।
*
साधारण-श्रेणी का भक्त विग्रह, मूर्ति आदि की पूजा-अर्चना तो श्रद्धा से करता है, परंतु
भगवान के भक्तों या अन्य लोगों की विशेष सेवा-शुश्रूषा नहीं करता।
उत्तम भागवत के लक्षण-
जो श्रवण एवं नेत्र आदि इंद्रियों के द्वारा
शब्द एवं रूप आदि विषयों का ग्रहण तो करता है; परंतु अपने अनुकूल विषयों के मिलने पर-
हर्षित नहीं होता और प्रतिकूल विषयों से द्वेष नहीं करता...
...उसकी दृष्टि में सभी कुछ उसके भगवान की माया है।(श्लोक-४८)
सांसारिक धर्म यथा-
जन्म-मृत्यु, भूख-प्यास, श्रम-कष्ट, भय और तृष्णा
ये क्रमशः शरीर, प्राण, इंद्रिय, मन और बुद्धि को प्राप्त होते ही रहते हैं...
...जो पुरुष भगवान की स्मृति में इतना तन्मय रहता है कि इन विषयों के बार-बार घटित होते रहने पर भी, उनसे मोहित नहीं होता या उनके पराभूत नहीं होता।
(श्लोक-४९)
~जिसके मन में विषय-भोग की इच्छा, कर्म-प्रवृत्ति और उनके बीच वासनाओं का उदय नहीं होता और जो एकमात्र वासुदेव में ही निवास करता है।
(श्लोक-५०)
~जिन्हें इस शरीर में न तो
उच्च-कुल में जन्म लेने का,
न तपस्या आदि कर्मों का,
न वर्ण अथवा आश्रम का और
न ही जाति का अहंकार हो- वह निश्चय ही भगवान को प्रिय होता है।
(श्लोक-५१)
~जो धन-संपत्ति अथवा शरीर आदि में अपना और पराया- ऐसा भेदभाव नहीं रखता, समस्त पदार्थों में सम-स्वरूप परमात्मा का दर्शन करता है और समभाव रखता है;
किसी भी घटना अथवा संकल्प से विक्षिप्त न होकर शांत रहता है।
(श्लोक-५२)
हे विदेहराज!
जो निरंतर भगवान के चरण-कमलों की सेवा में ही संलग्न रहता है...
...जिन चरणों को बड़े-बड़े देवता और ऋषि-मुनि भी अपने अंतःकरण को भगवन्मय बनाते हुए ढूंढते रहते हैं; भगवान के ऐसे चरण-कमलों से आधे क्षण/ आधे पल के लिए भी जो नहीं हटता-
यहां तक कि कोई उन्हें त्रिभुवन की राज्यलक्ष्मी ही क्यों न दे दे!
वह भगवत्-स्मृति का तार नहीं तोड़ता। उस राज्यलक्ष्मी की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता।
(श्लोक-५३)
जिन शरणागत भक्तों के हृदय का विरहजन्य संताप एक बार दूर हो चुका है; उनके हृदय में, वह फिर कैसे आ सकता है?
जैसे- चंद्रोदय होने पर फिर सूर्य का ताप नहीं लग सकता।
(श्लोक-५४)
~विवशतावश नाम उच्चारण करने पर भी संपूर्ण अघ(पाप)राशि को नष्ट कर देने वाले -स्वयं भगवान् श्रीहरि, जिसके हृदय को क्षण भर के लिए भी नहीं छोड़ते हैं, क्योंकि उसने प्रेम की डोर से उनके चरण-कमलों को बांध रखा है, वास्तव में ऐसे मनुष्य ही भगवान के भक्तों में प्रधान हैं।
(श्लोक-५५)
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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