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पौंड्रक वध

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  पौंड्रक वध 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 भगवान शुकदेव ने राजा परीक्षित से कहा हे राजन् , द्वापर युग में काशी नगरी की पूर्व दिशा में करूष देश ( चुनार ) था। यहां के राजा का नाम पौंड्रक था। जो अत्यंत , दंभी , लंपट , महत्वाकांक्षी और चापलूसों से सदैव घिरा रहने वाला था। इन चापलूसों ने उसे बताया कि आप ही कृष्ण वासुदेव हैं और जगत पूजनीय हैं। तबसे वह पीतांबर पहनने लगा। उसने कौस्तुभमणि की जगह एक बड़ा सा चमकता रत्न धारण किया। पौंड्रक ने स्वयं के मुकुट को मोर पंखों से सजाया और शंख एवं चक्र से सज्जित दो नकली हाथ लगाकर वह चतुर्भुज बन गया। अब ... स्वयं को वह ईश्वर कहने लगा।   घमंड से भर कर भगवान श्रीकृष्ण को पत्र लिखकर पौंड्रक ने चेतावनी दी कि वे अपने आप को श्रीकृष्ण , वासुदेव या द्वारकाधीश कहना छोड़ दें। शंख , चक्र , गदा और पद्म धारण करना छोड़ दें और कौस्तुभ मणि ना पहनें। अन्यथा इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।   पौंड्रक का संदेश पाकर , श्रीक...

श्रीमद्भागवत महात्म्य

  श्रीमद्भागवत महात्म्य 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼   श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के पश्चात महामुनि नारद ने एक बार पृथ्वीलोक की यात्रा की। पृथ्वी लोक में विभिन्न तीर्थों का दर्शन करने के पश्चात उनमें प्रभु की क्रीड़ास्थली वृंदावन का दर्शन करने की अभिलाषा जगी।किंतु वृंदावन पहुंचते ही उन्होंने जो पहला दृश्य देखा उससे उनका सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। उन्होंने देखा, एक दिव्य स्त्री शोकाकुल विलाप कर रही है। उसके पास दो वृद्ध मनुष्य अचेत अवस्था में पड़े हुए हैं जिनके केश बगुलों की भांति सफेद हो चुके हैं।पास ही कुछ सेविकाएं खड़ी हुई, उन्हें हवा झल रही हैं। और उनकी सेवा में तत्पर हैं।बीच-बीच में उस स्त्री के प्रयास से वे दोनों मनुष्य कुछ पल के लिए आंखें खोलते किंतु दुर्बलता के कारण पुनः अचेत हो जाते। नारद मुनि ने पास जाकर उस स्त्री से पूछा हे देवी आप कौन हैं? इन दोनों पुरुषों से आपका क्या संबंध है? और आपके इस तरह विलाप करने का क्या कारण हैइस पर उस स्त्री ने उत्तर दिया हे मुनिवर, मैं भक्ति हूं ये दोनों मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं।द्रविड़देश में मेरा जन्म हुआ। यज्ञयाग,तप,योग,ध्यान निष्ठा से ...

साधन-प्राश-४

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  🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 साधन-प्राश-४ प्रश्नकर्ता- निमि समाधानकर्ता- प्रबुद्ध 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 माया के पार जाने के उपाय  _______ यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभि:। तरन्त्यंज: स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्।।१७।। (अ०३/स्क०११) राजा निमि ने पूछा, महर्षि! भगवान की इस माया को पार करना उन लोगों के लिए तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मन को वश में नहीं कर पाए हैं।  कृपा करके यह बताइए कि जो शरीर आदि में आत्म-बुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ कम है, वे भी अनायास ही इस माया को कैसे पार कर सकते हैं? * अब चौथे योगीश्वर प्रबुद्ध जी ने कहा, राजन्!  स्त्री-पुरुष संबंधी बंधनों में पड़े हुए संसारी मनुष्य सुख की प्राप्ति और दुःख से निवृत्ति के लिए बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। उनके कर्मों का फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है इसका उन्हें विचार करना चाहिए। वे सुख के बदले दु:ख पाते हैं और दु:ख निवृत्ति के स्थान पर दिनों-दिन दु:ख  बढ़ता ही जाता है।  उन्हें माया के पार जाने के लिए यह समझ लेना चाहिए कि धन-संपत्ति, स्वजन-संबंधी आदि अनित्य और नाशवान हैं।  मृत्यु के पश्चात प्राप्त होने वाले लोक ...

साधन-प्राश-३:अंतरिक्ष

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  साधन-प्राश-३ प्रश्नकर्ता- निमि समाधानकर्ता- अंतरिक्ष 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 परस्य विष्णोरीशस्य "मायिनामपि मोहिनीम्"। मायां वेदितुमिच्छामो भगवन्तो ब्रुवन्तु न:।।१।। (अ०३/स्क०११) विदेहराज निमि ने उन योगीश्वरों से पूछा, भगवन्! सर्वशक्तिमान परमकारण भगवान् विष्णु की माया बड़े-बड़े मायावियों को भी मोहित कर देती है, अतः अब मैं उस माया का स्वरुप जानना चाहता हूं। तीसरे योगीश्वर अंतरिक्ष जी ने कहा, राजन्!   भगवान की माया स्वरुपत:   निर्वचनीय है अतः माया के कार्यों के द्वारा ही माया का निरुपण होता है। (अ) सृष्टि   भगवान् अंतर्यामी रुप से पंच महाभूतों के द्वारा [[आकाश (Space) , वायु (Quark), अग्नि (Energy), जल (Force) तथा पृथ्वी (Matter)]]   प्राणियों में प्रवेश करके, सर्वप्रथम स्वयं को मन के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। तत्पश्चात् पंच ज्ञानेन्द्रिय और पंच-कर्मेन्द्रिय के रूप में प्रकट होकर, प्राणियों को विषयों का भोग कराने लगते हैं। [[ पंच ज्ञानेंद्रियां- आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा; पंच कर्मेंद्रियां- हाथ, पैर, मुंह, गुदा और लिंग (और चार अं...

साधन-प्राश-२:भगवद्भक्त(भागवत) के लक्षण

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  साधन-प्राश-२ प्रश्नकर्ता- निमि समाधानकर्ता- हरि 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 भगवद्भक्त(भागवत) के लक्षण राजा ने निमि ने पूछा,  योगीश्वर!  अब आप कृपा करके भगवद्भक्त के लक्षण वर्णन कीजिये। अथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मो यादृशो नृणाम्। यथा चरति यद् ब्रूते यैर्लिङ्गैर्भगवत्प्रिय:।।४४।। (०२/११) ~उसके क्या धर्म हैं? और ~कैसा स्वभाव होता है? ~वह मनुष्यों के साथ व्यवहार करते समय कैसा आचरण करता है? ~क्या बोलता है? और ~किन "लक्षणों" के कारण भगवान का प्यारा होता है? दृष्टव्य- अर्जुन उवाच- स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। (श्रीमद्भगवद्गीता ५४/०२) * उन नौ योगीश्वरों में से दूसरे हरि जी ने कहा, हे राजन्!  आत्म स्वरूप भगवान् समस्त प्राणियों में आत्मा के रूप में अथवा नियंता के रूप में स्थित हैं। जो मनुष्य कहीं भी कम या अधिक मात्रा में न देख कर, सर्वत्र परिपूर्ण भगवत-सत्ता को ही देखता है और साथ ही साथ समस्त प्राणी और समस्त पदार्थ आत्म-स्वरूप भगवान में ही आधेय(स्थापित)-रूप  से अथवा अध्यस्त(आरोपित)-रूप से स्थित हैं, _ऐसा अनुभव करता है, उसे भगवान का ...

साधन-प्राश-१-भागवत धर्म का उपदेश

  साधन - प्राश - १ प्रश्नकर्ता - निमि समाधान कर्ता - कवि 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 भागवत धर्म का उपदेश * विदेहराज निमि ने उन नौ योगीश्वरों से कहा , " मैं ऐसा समझता हूं , कि आप लोग मधुसूदन भगवान् के पार्षद ही हैं। क्योंकि भगवान के पार्षद संसारी प्राणियों को पवित्र करने के लिये ही विचरण किया करते हैं। ~ जीवों के लिए मनुष्य शरीर का प्राप्त होना दुर्लभ है। ~ यदि वह प्राप्त हो जाता है तो प्रशिक्षण मृत्यु का भय सिर पर सवार रहता है ... दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर : । तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्।। ( २९ / ०२ / ११ ) क्योंकि जीवन क्षणभंगुर है , इसलिए इस अनिश्चित जीवन में भगवान से प्रेम करने वाले उनके भक्तजनों का और संतो का दर्शन तो और भी दुर्लभ है। ~ इसलिए , हे योगीश्वरों ! आप कृपा करके यह बताएं कि मनुष्य के परम कल्याण का स्वरुप क्या है ? उसका साधन क्या है ? इस संसार में आधे क्षण का सत्संग भी मनुष्यों के लिए परम निधि है , यदि...