श्रीमद्भागवत महात्म्य

 

श्रीमद्भागवत महात्म्य

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श्रीकृष्ण के स्वधाम गमन के पश्चात महामुनि नारद ने एक बार पृथ्वीलोक की यात्रा की।

पृथ्वी लोक में विभिन्न तीर्थों का दर्शन करने के पश्चात उनमें प्रभु की क्रीड़ास्थली वृंदावन का दर्शन करने की अभिलाषा जगी।किंतु वृंदावन पहुंचते ही उन्होंने जो पहला दृश्य देखा उससे उनका सारा उत्साह ठंडा पड़ गया। उन्होंने देखा, एक दिव्य स्त्री शोकाकुल विलाप कर रही है। उसके पास दो वृद्ध मनुष्य अचेत अवस्था में पड़े हुए हैं जिनके केश बगुलों की भांति सफेद हो चुके हैं।पास ही कुछ सेविकाएं खड़ी हुई, उन्हें हवा झल रही हैं। और उनकी सेवा में तत्पर हैं।बीच-बीच में उस स्त्री के प्रयास से वे दोनों मनुष्य कुछ पल के लिए आंखें खोलते किंतु दुर्बलता के कारण पुनः अचेत हो जाते।

नारद मुनि ने पास जाकर उस स्त्री से पूछा हे देवी आप कौन हैं? इन दोनों पुरुषों से आपका क्या संबंध है? और आपके इस तरह विलाप करने का क्या कारण हैइस पर उस स्त्री ने उत्तर दिया हे मुनिवर, मैं भक्ति हूं ये दोनों मेरे पुत्र ज्ञान और वैराग्य हैं।द्रविड़देश में मेरा जन्म हुआ। यज्ञयाग,तप,योग,ध्यान निष्ठा से ओतप्रोत दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में प्रसन्नतापूर्वक अपने दोनों पुत्रों के साथ मैं रह रही थी। वहां से हमने महाराष्ट्र में प्रवेश किया। जहां कुछ स्थानों पर हमें समुचित समादर प्राप्त तो हुआ, किंतु वैसा नहीं, जैसा दक्षिण में प्राप्त था। तब वहां से हम सौराष्ट्र की ओर बढ़े, जहां मेरे दोनों पुत्र ज्ञान और वैराग्य उपेक्षित हुए और उनका स्वास्थ्य गिरता गया। यहां तक कि उन्हें वार्धक्य प्राप्त हो गया। हमने वहां से यथाशीघ्र वृंदावन की ओर प्रस्थान किया किंतु वृंदावन में भी मेरे इन दोनों पुत्रों को कोई लाभ नहीं हुआ। अतः मैं अपने दोनों पुत्रों की इस अवस्था से दुखी हूं। ये सेविकाएं जो आप देख रहे हैं, ये तीर्थ और गंगा आदि पवित्र नदियां हैं, जो हर तरह से हमारी सेवा में उपस्थित हैं। हे मुनि श्रेष्ठ, आप तो त्रिकालदर्शी हैं, आपसे निवेदन है कि हमारे कष्टों का निवारण करें।

 इस पर नारद मुनि ने कहा-

 हे देवि, आपका स्थान भक्तों के हृदय में स्थित है और आप श्री हरि की अत्यंत प्रिय हैं। हे देवि, सतयुग, त्रेतायुग और द्वापर में मनुष्य भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के अवलंबन से मोक्ष को सहजता से प्राप्त हो जाते थे। मुक्ति, आपकी की दासी के रूप में सेवा में सदैव प्रस्तुत रहती थी। किंतु कलयुग के प्रभाव से दंभ और पाखंड के चलते मुक्ति बैकुंठ धाम चली गई है । उपेक्षा और तिरस्कार के कारण ज्ञान और वैराग्य अत्यंत दुखी हैं और उनके जीवन से सारा रस जाता रहा। भक्ति का अवलंबन इस कलयुग में कोई कोई ही समुचित ढंग से कर पाता है। किंतु यह कलयुग अत्यंत महत्वपूर्ण भी है, आज यज्ञकर्म "स्वर्ग प्राप्ति" के लिए ही किए जाते हैं परंतु मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान और वैराग्य का अवलंबन नहीं रह गया है। अतः हे देवि, आपको मनुष्य के हृदय में स्वयं को स्थापित करना होगा। मैं आपकी इस वेदना से स्वयं दुःख का अनुभव कर रहा हूं! अतः मैं आपके कष्ट निवारण के लिए अवश्य प्रयास करूंगा। यह कह कर नारदजी ने भक्ति को समस्त वेदों और गीतादि उपनिषदों के उपदेश दिए। फलस्वरूप भक्ति के अंगप्रत्यंग पुष्ट और कांतिपूर्ण हो ग‌ए। किंतु अभी भी ज्ञान और वैराग्य का प्रमाद, आलस्य और वार्धक्य दूर नहीं हुआ।

 

तब नारद मुनि कातर होकर श्रीहरि का स्मरण करने लगे।

तभी आकाशवाणी हुई

"हे नारद, इन देवी और इनके पुत्रों के कष्टों से मुक्ति का उपाय आपको यथासमय संतशिरोमणि बताएंगे।"

 

नारद मुनि आकाशवाणी के अनुसार संतशिरोमणि की खोज करते, विभिन्न तीर्थों में भ्रमण करते हुए ज्ञानियों और धर्मात्माओं से ज्ञान और वैराग्य के यौवन की पुनर्प्राप्ति का उपाय पूछते।

किंतु इस कार्य में कोई भी ज्ञानी, ध्यानी, योगी अथवा महात्मा नारद जी की सहायता करने में सक्षम नहीं हुआ।

कुछ ने तो यहां तक कह दिया कि यह कार्य असंभव है।

तब नारद जी स्वयं तपस्या करने के उद्देश्य से बदरी वन चल पड़े। वहां पहुंचकर उन्हें करोड़ों सूर्य की आभा से युक्त पांच वर्ष की आयु के चार‌ ओजस्वी ऋषि दिखाई दिए। ये चारों ऋषि थे सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार। चारों ही स्वर्णाभ एवं अत्यंत तेजयुक्त थे। नारद मुनि ने इन्हें सादर प्रणाम किया। चारों ऋषि कुमारों ने नारदजी का बदरीवन में स्वागत किया और उनके आने कारण पूछा।

इस पर नारद मुनि ने पूरी घटना को सुनाकर कहा

हे ऋषिगण, मैंने अनेकानेक प्रयास करके देखे, किंतु असफल रहा। अब किस प्रकार ज्ञान और वैराग्य को उनके यौवन और दिव्यता में प्रतिष्ठित किया जा सकता है और देवि भक्ति को मनुष्य के हृदय में स्थापित करने का  उपाय बताने की कृपा करें!

 

 इस पर सनतकुमारों ने कहा- हे मुनिवर, वेदरूपी तने और उपनिषदों की शाखाओं से युक्त वृक्ष का परिपक्व किंतु बीज रहित फल है- "श्रीमद्भागवत"। इसके रस का यथाविधि एक सप्ताह तक सेवन करने पर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होकर मनुष्य के हृदय में स्थापित हो जाएंगे। बालमुनि शुकदेव के मुख से जूठा होने के कारण यह फल अत्यंत मधुर हो उठा है। अतः इसका पान करने से मनुष्य को इस कलयुग में भी मोक्ष की प्राप्ति संभव हो सकेगी। कलयुग में श्रीमद्भागवत कथा का सप्ताह परायण ही भगवद्प्राप्ति का एकमात्र उपाय है। अतः आप हरिद्वार के निकट आनंदवन में गंगा तट पर श्रीमद्भागवत की सप्ताह कथा का आयोजन करें।

 

श्रीमद्भागवत के सप्ताह परायण का संपूर्ण आयोजन होने पर चारों ऋषिकुमार विधिविधान सहित व्यासपीठ पर आसीन हुए।

जैसे ही यह समाचार मिला, स्वर्गलोक के देवता, इंद्रलोक से गंधर्व, किन्नर, पृथ्वी के विभिन्न ऋषि-मुनि आदि इस कथामृत का पान करने उपस्थित हुए।

ज्ञान और वैराग्य को साथ लेकर भक्ति भी हरिद्वार के आनंदवन में गंगा तट पर उपस्थित हुईं।

श्रीमद्भागवत की कथा के समापन पर देवताओं गंधर्व किन्नरों और भूलोक के उपस्थित ऋषि-मुनियों और मनुष्यों, पशु-पक्षियों,  वन-कांतर-नद-नदी-पर्वत आदि द्वारा उल्लास के साथ उत्सव मनाया गया।

 

इस तरह सनकादिक ऋषियों ने श्रीमद्भागवत महापुराण कथा के द्वारा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के कष्टों का निवारण किया।इससे ज्ञान, वैराग्य एवं भक्ति तीनों ही अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुए और श्रीहरि की महिमा गान करते हुए सोल्लास नर्तन करने लगे।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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