साधन-प्राश-४


 

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साधन-प्राश-४

प्रश्नकर्ता- निमि

समाधानकर्ता- प्रबुद्ध

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माया के पार जाने के उपाय 

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यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभि:। तरन्त्यंज: स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्।।१७।।

(अ०३/स्क०११)

राजा निमि ने पूछा,

महर्षि!

भगवान की इस माया को पार करना उन लोगों के लिए तो बहुत ही कठिन है, जो अपने मन को वश में नहीं कर पाए हैं। 

कृपा करके यह बताइए कि जो शरीर आदि में आत्म-बुद्धि रखते हैं तथा जिनकी समझ कम है,

वे भी अनायास ही इस माया को कैसे पार कर सकते हैं?

*

अब चौथे योगीश्वर प्रबुद्ध जी ने कहा,

राजन्!

 स्त्री-पुरुष संबंधी बंधनों में पड़े हुए संसारी मनुष्य सुख की प्राप्ति और दुःख से निवृत्ति के लिए बड़े-बड़े कर्म करते रहते हैं। उनके कर्मों का फल किस प्रकार विपरीत होता जाता है इसका उन्हें विचार करना चाहिए।

वे सुख के बदले दु:ख पाते हैं और दु:ख निवृत्ति के स्थान पर दिनों-दिन दु:ख  बढ़ता ही जाता है।

 उन्हें माया के पार जाने के लिए यह समझ लेना चाहिए कि धन-संपत्ति, स्वजन-संबंधी आदि अनित्य और नाशवान हैं।

 मृत्यु के पश्चात प्राप्त होने वाले लोक और परलोक भी ऐसे ही नाशवान हैं क्योंकि   वे लोक भी कर्मों के सीमित फल मात्र हैं...

...अत: जो परम कल्याण के जिज्ञासु हैं, उन्हें 

~गुरु की शरण में जाना चाहिये।

सदगुरु ऐसे हों जो शब्दब्रह्म-वेदों के पारदर्शी विद्वान हों जिससे वे उन्हें ठीक-ठीक समझा सकें।

साथ ही उन्हें परब्रह्म का तत्वज्ञान भी होना चाहिये ताकि अपने अनुभव के द्वारा प्राप्त हुई रहस्य की बातों को बता सकें।

 उनका चित्त शांत हो, व्यवहार के प्रपंच में विशेष प्रवृत्त न हों।(श्लोक-२१)

~जिज्ञासु को चाहिए कि

वह गुरु को ही अपना परम प्रियतम आत्मा और इष्टदेव माने।

निष्कपट भाव से उनकी सेवा करे और उनके पास रहकर भागवत धर्म की, भगवान् को प्राप्त कराने वाली भक्तिभाव के साधनों की क्रियात्मक शिक्षा ग्रहण करे।

~अनासक्ति

जिज्ञासु को चाहिए कि पहले शरीर, संतान आदि में मन की आसक्ति सीखे।

भगवान के भक्तों से प्रेम कैसे करना चाहिए यह सीखे।

फिर प्राणियों के प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनय की निष्कपट भाव से शिक्षा ग्रहण करे।

~पवित्रता

अपने बाह्य शरीर की पवित्रता के साथ ही

छल-कपट आदि के त्याग से भीतर की पवित्रता,

अपने धर्म का अनुष्ठान, सहनशक्ति, मौन, स्वाध्याय सरलता, ब्रहमचर्य, अहिंसा तथा शीतोष्ण, सुख-दु:ख आदि द्वन्द्वों में हर्ष-विषाद से रहित होना सीखे।

सर्वत्र ईश्वर दर्शन

जिज्ञासु को चाहिए कि वह संतोष करना सीखे और

देश, काल और वस्तुओं में चेतनरूप से आत्मा और नियंतारूप से ईश्वर को देखे।

(श्लोक क्र० २२ - २५)

 जिज्ञासु को चाहिए कि

भगवान की प्राप्ति का मार्ग बतलाने वाले शास्त्रों में श्रद्धा तो रखे किन्तु अन्य शास्त्रों की निंदा न करे।

प्राणायाम के द्वारा मन का, मौन के द्वारा वाणी का और वासना-हीन होने के अभ्यास से-

कर्मों का संयम करना सीखे।

सदा सत्यवादी रहे,

इंद्रियों को अपने-अपने गोलोकों(गो=इंद्रिय) में स्थिर रखे और

मन को संयमित रखने का अभ्यास सीखे।(श्लोक-२६)

श्रवणं कीर्तनं ध्यानं हरेरद्भुतकर्मण:। जन्मकर्मगुणानां च तदर्थेऽखिलचेष्टितम्।।२७।। भगवान की अद्भुत लीलाओं का श्रवण, कीर्तन एवं ध्यान करना सीखे तथा शरीर से जितनी भी चेष्टाएं की जाती हैं, उन सभी को भगवान् के लिए ही करना सीखे।

इष्टं दत्तं तपो जप्तं वृत्तं यच्चात्मन: प्रियम्। दारान् सुतान् गृहान् प्राणान् यत् परस्मै निवेदनम्।।२८।।

यज्ञ, दान, तप एवं जप सदाचार का पालन, स्त्री, पुत्र घर, अपना जीवन, प्राण तथा जो कुछ भी प्रिय लगता है; वह सब का सब भगवान के चरणों में निवेदन करते हुए उन्हें सौंप देना सीखे।

*

सेवा और परोपकार

जिज्ञासु को चाहिए कि

स्थावर एवं जंगम दोनों की ही यथायोग्य सेवा करना सीखे। विशेष करके मनुष्यों की, उनमें भी परोपकारी सज्जनों की, और उनमें भी भगवद्प्रेमी संतो की सेवा करना सीखे।

(श्लोक-२९)

सत्संग और भगवद्चर्चा 

और परस्पर प्रेम करना सीखे, आत्मसंतुष्टि और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करना सीखे।

(श्लोक-३०)

राजन्!

श्रीकृष्ण अनेक पापों को एक ही क्षण में भस्म कर देते हैं। अतः सब उन्हीं का स्मरण करें और एक-दूसरे को उनका स्मरण कराएं।

इस प्रकार साधन-भक्ति का अनुष्ठान करते हुए, प्रेम-भक्ति का उदय हो जाता है और वह प्रेमोद्रेक से पुलकित शरीर धारण करते हैं।

(श्लोक-३१)

*

राजन्!

जो भगवद्प्रेम से पुलकित शरीर धारण करते हैं,

उनके हृदय की स्थिति बड़ी विलक्षण होती है-

कभी-कभी तो वे सोचते हैं कि अभी तक भगवान् नहीं मिले-

अब मैं क्या करूं?

कहां जाऊं?

किससे पूछूं?

कौन मुझे उन की प्राप्ति करा सकता है?

इस तरह सोचते हुए वे रोने लगते हैं।

कभी भगवान की लीलाएं याद करके खिलखिला कर हंसने लगते हैं।

 कभी उनके प्रेम और दर्शन की अनुभूति से आनंदमग्न हो जाते हैं तो कभी लोकातीत भाव में स्थित होकर भगवान् से वार्तालाप करने लगते हैं! कभी उनके गुणों का ध्यान करते हैं और कभी नृत्य करके उन्हें रिझाने लगते हैं। कभी-कभी उन से एकाकार होकर, उनकी सन्निधि में स्थित होकर परम शांति का अनुभव करते हैं।

 हे राजन!

जो इस प्रकार भागवत धर्मों की शिक्षा ग्रहण करते हैं, उन्हें उनके द्वारा  प्रेमाभक्ति की प्राप्ति हो जाती है और वे भगवान् के परायण होकर उस माया को अनायास ही पार कर जाता है, जिसके पंजे से निकलना बहुत ही कठिन है।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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