साधन-प्राश-१-भागवत धर्म का उपदेश

 


साधन-प्राश-

प्रश्नकर्ता- निमि

समाधान कर्ता- कवि

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भागवत धर्म का उपदेश

*

विदेहराज निमि ने उन

नौ योगीश्वरों से कहा,

"मैं ऐसा समझता हूं, कि आप लोग मधुसूदन भगवान् के पार्षद ही हैं। क्योंकि भगवान के पार्षद संसारी प्राणियों को पवित्र करने के लिये ही विचरण किया करते हैं।

~जीवों के लिए मनुष्य शरीर का प्राप्त होना दुर्लभ है।

~यदि वह प्राप्त हो जाता है तो प्रशिक्षण मृत्यु का भय सिर पर सवार रहता है...

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुर: तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्।।(२९/०२/११)

क्योंकि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए इस अनिश्चित जीवन में भगवान से प्रेम करने वाले उनके भक्तजनों का और संतो का दर्शन तो और भी दुर्लभ है।

~इसलिए, हे योगीश्वरों!

आप कृपा करके यह बताएं कि मनुष्य के परम कल्याण का स्वरुप क्या है?

उसका साधन क्या है?

इस संसार में आधे क्षण का सत्संग भी मनुष्यों के लिए परम निधि है, यदि हम सुनने के अधिकारी को तो आप कृपा करके भागवत-धर्मों का उपदेश कीजिए।

*

नारदजी ने वसुदेवजी से कहा,

उन नौ योगीश्वरों में से सर्वप्रथम कवि जी ने  कहा,

राजन्!

~भक्तजनों के हृदय से कभी दूर होने वाले अच्युत भगवान के चरणों की नित्य-निरंतर उपासना ही इस संसार में परम कल्याणकारी और भयशून्य करने वाली है। इससे, इन देह-गेह आदि तुच्छ-पदार्थों से अहंता-ममता होने के कारण जिनका चित्त उद्विग्न हो रहा है, उनके भय की निवृत्ति हो जाती है। 

~"अपनी प्राप्ति के लिये" जो उपाय भगवान ने स्वयं अपने श्रीमुख से बतलाए हैं, उन्हें ही  समझो।

~इनका अवलंबन करके मनुष्य कभी विघ्नों से पीड़ित नहीं होता और नेत्र बंद करके दौड़ने पर भी तो मार्ग से स्खलित होता, ही उसका पतन होता और ही वह इस के सुफल से वंचित होता।

~कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्धयाऽऽत्मना वानुसृतस्वभावात्। करोति यद् यत् सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्।।३६।।(अ०२/स्क०११)

दृष्टव्य-

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्।।

(भगवान उवाच//

श्रीमद्भगवद्गीता- /२७)

~वह शरीर, वाणी, मन, इंद्रियों, बुद्धि अथवा अहंकार से; अनेक जन्मों अथवा इसी जन्म की आदतों के स्वभाववश जो भी करता है, वह सभी परमपुरुष भगवान नारायण के लिए ही है, इस भाव से उन्हें समर्पण कर दे।

ईश्वर-विमुख पुरुष, उन्हीं ईश्वर की माया से मुग्ध होकर, विभिन्न प्रकार के रोग, बुढ़ापा, मृत्यु आदि भय के कारणों से ग्रस्त हो जाता है... अतः अपने गुरु को ही आराध्यदेव परमप्रियतम मान कर अनन्य भक्ति के द्वारा उस ईश्वर का भजन करना चाहिये *क्योंकि भगवान के अतिरिक्त, आत्मा के अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं।*

इसलिए विचारवान पुरुष को चाहिए कि सांसारिक कर्मों के संबंध में संकल्प-विकल्प करने वाले मन को रोक ले...

बस! ऐसा करते ही उसे अभयपद की, परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी।

~संसार में भगवान के जन्म और उनकी लीलाओं की कई मंगलमय कथाएं प्रसिद्ध हैं, उनका श्रवण और स्मरण करते हुए, लज्जा एवं संकोच को छोड़कर, उनका गान करते रहना चाहिए...

~इससे- नाम संकीर्तन से, ईश्वर के प्रति अनुराग एवं प्रेम का अंकुर उग आता है।

उसका चित्त द्रवित हो जाता है और वह साधारण मनुष्यों की स्थिति से ऊपर उठ जाता है। लोगों की मान्यताओं और धारणाओं से परे हो जाता है। ~वह दंभ से नहीं, वरन् स्वभाव से ही मतवाला होकर कभी खिल-खिलाकर हंसने लगता है- तो कभी फूट-फूट कर रोने लगता है! कभी ऊंचे स्वर से भगवान को पुकारने लगता है- तो कभी मधुर स्वर से उनके गुणों का गान करने लगता है।

~कभी-कभी जब वह अपने प्रियतम को- अपने नेत्रों के सामने अनुभव करता है, तब उन्हें रिझाने के लिए नृत्य भी करने लगता है...

(श्लोक- ३७-४०)

हे राजन्!

~यह आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, प्राणी, दिशाएं, वृक्ष-वनस्पति, नदी, समुद्र... सभी भगवान के शरीर हैं। सभी रुपों में स्वयं भगवान प्रकट हैं- ऐसा समझकर जो भी उसके सामने जाता है-

चाहे वह प्राणी हो या अप्राणी...वह उसे अनन्यभाव से, भगवद्भाव से प्रणाम करता है।

जैसे भोजन करने वाले को प्रत्येक ग्रास के साथ ही तुष्टि(संतुष्टि), पुष्टि(पोषण) और क्षुधा-निवृत्ति(भूख शांत होना) तीनों की प्राप्ति होती है; वैसे ही, जो मनुष्य भगवान की शरण लेकर उनका भजन करने लगता है उसे- भजन के प्रत्येक क्षण में 'भगवान के प्रति प्रेम', 'अपने प्रेमास्पद प्रभु के स्वरुप का अनुभव' और 'उन(ईश्वर)के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं में वैराग्य' एक साथ ही प्राप्त हो जाते हैं।

 हे राजन्!

इस प्रकार जो प्रतिक्षण एक-एक वृत्ति के द्वारा भगवान के चरण-कमलों का ही भजन करता है, उसे भगवान् के प्रति प्रेममयी-भक्ति, संसार के प्रति वैराग्य और अपने प्रियतम भगवान के स्वरुप की स्फूर्ति ये सभी अवश्य ही प्राप्त होते हैं।

वह "भागवत" हो जाता है और इन सभी की प्राप्ति हो जाने पर उसे परमशांति का अनुभव होने लगता है।(श्लोक-४१-४३)

 

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नमो भगवते वासुदेवाय।


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