बलराम चरित-१ (रोमहर्षण सूतजी का वध)

 भागवत के मोती-१

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बलराम चरित-१ (रोमहर्षण सूतजी का वध)

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बलरामजी की मध्यस्थता और भगवान श्रीकृष्ण के सभी प्रयासों के निष्फल हो जाने पर, जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध की स्थिति निश्चित हो गई, तब बलरामजी ने किसी का पक्ष ले कर युद्ध में उतरना उचित नहीं समझा और वे तीर्थ में स्नान करने के बहाने द्वारका से चले गए। कौरव और पाण्डव उन्हें समान रूप से प्रिय थे।

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सर्वप्रथम उन्होंने प्रभास क्षेत्र में स्नान किया और तर्पण तथा ब्राह्मण भोज के द्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों और मनुष्यों को तृप्त किया फिर वे कुछ ब्राह्मणों के साथ सरस्वती नदी के उद्गम की ओर चल पड़े।

 क्रमशः प्रधान तीर्थ में होते हुए वह नैमिषारण्य जा पहुंचे जहां बड़े-बड़े ऋषि सत्संग रूप महान सत्र कर रहे थे। दीर्घकाल तक सत्संग सत्र का नियम लेकर बैठे हुए ऋषियों ने बलराम जी को आया देख अपने-अपने आसनों से उठकर उनका स्वागत-सत्कार किया और यथायोग्य प्रणाम, आशीर्वाद करके उनकी पूजा की। 

जब वे अपने साथियों के साथ आसन ग्रहण करके बैठे, तब उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजी के शिष्य रोमहर्षण जी व्यासपीठ पर बैठे हुए हैं।

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बलरामजी ने देखा कि सूतजी का आसन वहां उपस्थित ब्राम्हणों के आसनों से ऊंचा था।

रोमहर्षणजी सूत जाति में उत्पन्न होकर भी अपने से श्रेष्ठ ब्राम्हणों के आने पर न तो उठकर उनका स्वागत करते हैं और न ही उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।

यह देकर बलरामजी को क्रोध आ गया। 

उन्होंने कहा,

यह रोमहर्षण प्रतिलोम जाति का होने पर भी, इन श्रेष्ठ ब्राम्हणों से तथा धर्म के रक्षक हम लोगों से भी ऊपर बैठा हुआ है! भगवान व्यासदेव का शिष्य होकर इसने इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि बहुत से शास्त्रों का अध्यन किया है। परंतु अभी इसका अपने मन पर संयम नहीं है। "यह विनीत नहीं है"। इसने अपने आपको बहुत बड़ा पंडित मान रखा है और इसकी सारी चेष्टाएं नट की तरह अभिनय मात्र हैं। इसका सारा अध्ययन स्वाँग के लिए है, उससे न इसका लाभ है और न किसी दूसरे का।

उन्होंने कहा,

 जो लोग धर्म का चिन्ह धारण करते हैं परंतु धर्म का पालन नहीं करते वे अधिक पापी हैं और वे मेरे लिए वध करने योग्य हैं, इस जगत में मैंने अवतार इसीलिए लिया है। 

जो भगवान बलराम तीर्थयात्रा के कारण दुष्टों के वध से (महाभारत के युद्ध से) भी अलग हो गए थे, उन्हीं बलरामजी ने अपने हाथ में स्थित कुश की नोक से रोमहर्षण सूतजी पर प्रहार कर दिया और तत्क्षण ही उनकी मृत्यु हो गई।

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रोमहर्षण सूतजी की मृत्यु होते ही वहां उपस्थित सभी ऋषि-मुनि हाय हाय करने लगे।

सभी के चित्त खिन्न हो गए। उन्होंने बलरामजी से कहा, प्रभो! अपने यह बहुत बड़ा अधर्म किया है। यदुवंशशिरोमणे! सूतजी को हम लोगों ने ही ब्राह्मणोचित आसन पर बिठाया था।

जब तक हमारा यह सत्र समाप्त न हो, तब तक के लिए उन्हें कष्ट रहित आयु भी दे दी थी।

आपने अनजाने में ही ऐसा काम कर दिया, जो ब्रह्महत्या के समान है।

"आप योगेश्वर हैं, हम लोग यह मानते हैं। वेद भी आप पर शासन नहीं कर सकता। फिर भी, आपसे यह प्रार्थना है कि यदि आप स्वेच्छा से ब्रह्महत्या का प्रायश्चित कर लें तो इससे लोगों को बहुत शिक्षा मिलेगी।" आपका अवतार लोगों को पवित्र करने के लिए हुआ है।

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बलरामजी ने कहा,

 मैं लोगों पर अनुग्रह करने के लिए और उन्हें शिक्षा देने के लिए इस ब्रह्म हत्या का प्रायश्चित अवश्य करूंगा अतः इसके लिए प्रथम श्रेणी का (सबसे कठिन) जो प्रायश्चित हो, आप लोग उसी का विधान कीजिए। यदि आप लोग इन्हें लंबी आयु, बल, इंद्रियशक्ति आदि जो कुछ भी देना चाहते हों; मुझे बता दीजिए। मैं अपने योगबल से सभी कुछ संपन्न किए देता हूं।

ऋषियों ने कहा,

बलरामजी आप ऐसा कोई उपाय कीजिए, जिससे आपका शस्त्रपराक्रम और इनकी मृत्यु व्यर्थ न हो।

और हम लोगों ने इन्हें जो वरदान दिया था, वह भी सत्य हो जाए।

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ऋषियों ने कहा,

बलराम जी! आप कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे आपका शस्त्र(कुश), पराक्रम और इन (सूतजी) की मृत्यु भी व्यर्थ न हो और हम लोगों ने इन्हें जो वरदान (सत्र समाप्त होने तक कोई शारीरिक कष्ट न हो) दिया था,  वह भी सत्य हो जाय।

बलरामजी ने कहा,

ऋषियों! वेदों का कथन है कि "आत्मा ही पुत्र के रूप में उत्पन्न होती है"। इसलिए रोमहर्षण सूतजी के स्थान पर उनके पुत्र "उग्रश्रवा(सूतजी)" आप लोगों को पुराणों की कथा सुनाएंगे। उन्हें मैं अपनी शक्ति से दीर्घायु, इंद्रियशक्ति और बल दिए देता हूं। ऋषियों! इसके अतिरिक्त आप लोग और जो कुछ भी चाहते हों, मुझसे कहिये; मैं आप लोगों की इच्छा पूर्ण करूंगा। अनजान में ही मुझसे जो अपराध हो गया है, उसका प्रायश्चित आप लोग सोच-विचार कर बतलाइए; क्योंकि आप लोग इस विषय के विद्वान हैं!

 ऋषियों ने कहा,

बलराम जी! "#इल्वल"  का पुत्र "बल्वल" एक भयंकर दानव है। वह प्रत्येक पर्व पर आकर, हमारे सत्र को दूषित कर देता है। आप उस पापी का वध कर डालिए। यदुनंदन! यह हम लोगों की बड़ी सेवा होगी। इसके बाद आप एकाग्र चित्त से तीर्थ में स्नान करते हुए बारह महीनों तक भारत वर्ष की परिक्रमा करते हुए विचरण कीजिए इससे आपकी शुद्धि हो जाएगी।

(#दृष्टव्य- इल्वल और वातापि की कथा// यथासंभव अगले अंक में )

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