सुदामा चरित-२
सुदामा चरित-३
सुदामा चरित-२
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यह कथा सूतजी शौनकादि ऋषियों को सुना रहे हैं-
राजा परीक्षित के प्रश्नों पर, (जो पिछले अंक-१२९:
सुदामा चरित-१ में हमने श्लोक एवं भजन के माध्यम से दिए हैं)
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
मित्रता का धर्म और आदर्श
एक ब्राह्मण
भगवान् श्रीकृष्ण के परममित्र, ब्रह्मज्ञानी, विषयों से विरक्त, शांतचित्त और जितेंद्रिय थे।
गृहस्थ होने पर भी वे किसी प्रकार का संग्रह परिग्रह न रखकर, प्रारब्ध से रूखा-सूखा जो कुछ मिल जाता उसी में संतुष्ट रहते। उनकी पत्नी भी वैसी ही थीं। दोनों ही भूख से अत्यंत दुर्बल हो रहे थे।
एक दिन उन ब्राम्हण देवता की पत्नी ने अपने पति से कहा,
लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण आपके सखा हैं, वे कल्पतरु, शरणागतवत्सल और ब्राह्मणों के परम भक्त हैं। आप उनके पास जाइये। जब वे जानेंगे कि आप गृहस्थ हैं, और अन्न के बिना दुःख पा रहे हैं, तब वे आपको बहुत-सा धन दे देंगे। पत्नी द्वारा बार-बार विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करने पर, उन ब्राम्हण देव ने सोचा, धन की तो कोई बात नहीं है; परंतु भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन हो जाएगा- यही जीवन का बहुत बड़ा लाभ है!
यह विचार करके उन्होंने जाने का निश्चय किया और अपनी पत्नी से कहा,
"कल्याणी! घर में भेंट देने योग्य यदि कुछ हो, तो दे दो? तब उस ब्राम्हणी ने पास-पड़ोस के ब्राम्हणों के घर से चार मुट्ठी चिवड़ा मांग कर एक कपड़े में बांध दिया। ब्राह्मण देवता कपड़े की उस पोटली को लेकर द्वारका के लिए चल पड़े।
परीक्षित! रास्ते भर उनके चिंतन का विषय था- मुझे भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन कैसे प्राप्त होंगे?
*
द्वारका पहुंचने पर अन्य ब्राह्मणों के साथ उन ब्राम्हण देवता ने सैनिकों की
तीन छावनी और तीन ड्यौढ़ियां पार करके,
भगवत्-धर्म का पालन करने वाले अंधक और वृष्णिवंशी यादवों के महल में जा पहुंचे। जहां भगवान श्रीकृष्ण की रानियों के महल थे।
उनमें से एक में ब्राम्हण देवता ने प्रवेश किया।
उसी महल में भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्राणप्रिया रुक्मिणीजी के पलंग पर विराजे हुए थे।
ब्राह्मण देवता को दूर से ही देखकर वे सहसा उठ खड़े हुए और उनके पास आकर बड़े आनंद से उन्हें अपने भुजपाश में इस तरह बांध लिया जैसे वे उनके बड़े भाई बलदाऊ जी हों!
परीक्षित!
परमानंद स्वरुप भगवान अपने प्यारे सखा ब्राम्हण देवता के अंगस्पर्श से अत्यंत आनंदित हुए और उनके कमलनयनों से प्रेमाश्रु बहने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी पलंग पर बिठा दिया और स्वयं पूजन-सामग्री लाकर उनकी पूजा की।
सभी को पवित्र करने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने अपने हाथों से ब्राम्हण देवता के पांव पखार कर उनका चरणोदक अपने सिर पर धारण किया और उनके शरीर में दिव्यगंधों का लेपन किया। फिर उन्होंने उनकी आरती उतारी।
इस प्रकार भगवान ने अपने प्रिय सखा का स्वागत किया। उस समय स्वयं भगवती रुक्मिणीजी चँवर डुला कर उनकी सेवा करने लगीं।
अंत:पुर की स्त्रियां यह देख कर विस्मित हो गईं कि भगवान् अतिशय प्रेम के साथ इन अवधूत की पूजा कर रहे हैं।
*
श्रीमद्भागवत में लिखा है-
अंत:पुर की स्त्रियां सोच रही हैं-
इस
श्रियाहीन (दरिद्र ब्राह्मण) भिक्षु ने ऐसा कौन-सा पुण्यकर्म किया है जो स्वयं श्रीनिवास (श्रीकृष्ण) इसका इतना आदर-सत्कार कर रहे हैं?
(भगवान् श्रीकृष्ण ने
ब्राह्मण देवता से जो कहा,
वह कदाचित अंत:पुर की स्त्रियों के प्रश्न का ही उत्तर है।)
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा,
धर्म के मर्मज्ञ! ब्राह्मणदेव! गुरुदक्षिणा देकर जब आप गुरुकुल से लौट आए,
तब आपने विवाह किया या नहीं?
मैं जानता हूं कि आप का चित्त गृहस्थी में रहने पर भी प्रायः विषय भोगों में आसक्त नहीं है।
विद्वन! मुझे यह भी मालूम है कि धन आदि में भी आपकी कोई प्रीति नहीं है।
जगत् में विरले ही लोग ऐसे होते हैं जो भगवान की माया से निर्मित विषय-संबंधी वासनाओं का त्याग कर देते हैं और चित्त में विषयों की तनिक भी वासना न रहने पर भी मेरी तरह केवल लोकशिक्षा के लिए कर्म करते रहते हैं।
ब्राह्मण शिरोमणे!
क्या आपको उस समय की बात याद है, जब हम दोनों एक साथ गुरुकुल में निवास करते थे?
गुरुकुल में ही द्विजातियों को अपनी "ज्ञातव्य वस्तु" का ज्ञान होता है, जिसके द्वारा वे अज्ञान-अंधकार से पार हो जाते हैं।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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