बलराम चरित-२ (बल्वल वध)
बलराम चरित-२
(बल्वल वध)
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पिछले अंक में हमने पढ़ा कि बलरामजी को रोमहर्षण सूतजी की हत्या से लगे ब्रह्महत्या के पाप के मोचन हेतु ऋषि-मुनियों द्वारा जो उपाय सुझाए गए उसके समाधान स्वरूप उन्होंने
रोमहर्षण सूतजी के पुत्र श्रीउग्रश्रवा सूतजी को नैमिषारण्य के सत्र में उपस्थित ऋषि-मुनियों को
व्यासपीठ प्रदान किया। (महापुराण की कथा सुनाने हेतु) था।
उसके उपरांत
बलरामजी को बल्वल नामक दैत्य का वध करके, ऋषियों के सत्संग-सत्र और पर्व को निरापद करना था।
यह बल्वल इल्वल का पुत्र था।
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हम यहां संक्षेप में इल्वल और वातापी की कथा द्वारा आज की कथा आरंभ करेंगे।
(यह कथा महाभारत के वनपर्व के अंतर्गत तीर्थयात्रा-पर्व में दी गई है।
कथा इस प्रकार है-
इल्वल और वातापी
अगस्त्य ऋषि को धन प्राप्ति की कामना से दैत्यराज इल्वल के पास जाना पड़ा। इल्वल और उसका भाई वातापी ब्राह्मणों के प्रति वैर भाव रखते थे तथा उन्हें ब्राम्हणों की हत्या करने में बड़ा सुख प्राप्त होता था। ब्राह्मणों की हत्या करने का उसका ढंग भी बड़ा ही अनोखा था।
वे ब्राम्हणों को भोज के लिए आमंत्रित करते, वातापी किसी भी जीव का रूप धारण करने में सिद्ध था।
वह अतिथि की रुचि के अनुसार रूप धारण कर लिया करता।
इल्वल उसे रांधकर (पका कर) उस ब्राह्मण को खिला देता।
जब इल्वल पुकारता-
वातापि अत्रागच्छ!
तब वातापि जीवित होकर,
उस ब्राह्मण का पेट फाड़ कर बाहर निकल आता।
इससे उसे खाने वाले ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती।
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जब अगस्त्य मुनि इल्वल के पास धन की कामना से पहुंचे, तो उसने आदर पूर्वक मुनिश्रेष्ठ का स्वागत किया और उन्हें भोजन हेतु आमंत्रित किया।
भोजन पूर्व जब ऋषि स्नान हेतु नदी पर गये, तब उसने अपने भाई वातापी को बकरा बना दिया और उसे रांध(पका) कर अगस्त्य ऋषि को परोस दिया।
अगस्त्य ऋषि ने भोजन के उपरांत अपने उदर पर हाथ फिराते हुए कहा- "जीर्णोभव"
जब इल्वल ने पुकारा-
वातापी अत्रागच्छ।
तब अगस्त्य मुनि ने मुस्कुराते हुए कहा-
अब तुम्हारा वह भाई वातापी नहीं आ सकता।
क्योंकि मेरे
जीर्णो भव बोलने से ही वह क्षार(राख/हजम) हो चुका है।
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उसी इल्वल का पुत्र बल्वल था जो अपने चाचाजी (वातापी) की मृत्यु का प्रतिशोध ब्राह्मणों की हत्या करके और उनके यज्ञ और सत्र को अपवित्र करके ले रहा था। अस्तु।
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बल्वल वध
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
पर्व का दिन आने पर बड़ा भयंकर अंधड़ चलने लगा। धूल की वर्षा होने लगी और चारों ओर से दुर्गंध आने लगी।
इसके बाद यज्ञशाला में बल्वल ने अपवित्र वस्तुओं की वर्षा की और फिर हाथों में त्रिशूल लिए वह स्वयं दिखाई पड़ा।
उसका डील-डौल बहुत बड़ा था- ऐसा जान पड़ता था, मानों कालिख का ढेर इकट्ठा कर दिया गया हो।
उसे देख कर भगवान बलरामजी ने शत्रु सेना को कुंद करने वाले मूसल "सुनन्द"
और दैत्यों को चीर-फाड़ डालने वाले अपने "हल" का स्मरण किया।
उनके वे दोनों शस्त्र तुरंत आ पहुंचे।
बलरामजी ने आकाश में विचरण करने वाले दैत्य बल्वल को अपने हल के अग्रभाग से खींच कर, उसके सिर पर, क्रोध पूर्वक मूसल का जोरदार प्रहार किया जिससे उसका मस्तक फट गया और वह खून उगलता आर्त-स्वर में चिल्लाता हुआ धरती पर गिर पड़ा।
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नैमिषारण्य में उपस्थित महाभाग्यवान ऋषि-मुनियों ने बलरामजी की स्तुति की और उन्हें कभी व्यर्थ न होने वाले आशीर्वाद प्रदान किए।
बल्वल वध के पश्चात नैमिषारण्य वासी ऋषि-मुनियों से विदा लेकर, उन्हीं की आज्ञा अनुसार बलरामजी ने ब्राम्हणों के साथ कौशिकी नदी के तट पर आकर स्नान किया और वहां से अपनी तीर्थ यात्रा आरंभ की।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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