बलराम चरित-४

 बलराम चरित-४

तीर्थयात्रा से लौटकर...

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प्रभास क्षेत्र में 

तीर्थयात्रा पूरी करने के बाद जब बलरामजी वापस प्रभास क्षेत्र में चले आए तब उन्हें ब्राह्मणों ने बताया कि 

कौरवों और पाण्डवों के युद्ध में अधिकांश क्षत्रियों का संहार हो गया है।

उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि अब पृथ्वी का बहुत-सा भार उतर गया है।

(बलराम जी शेषनाग का ही अवतार हैं, जिनके फणों के ऊपर पृथ्वी स्थापित है। अस्तु।) 

 (दुर्योधन और भीम का गदा युद्ध)

जिस दिन रणभूमि में भीमसेन और दुर्योधन का गदा युद्ध होना था, उसी दिन बलरामजी उन्हें रोकने के लिये कुरुक्षेत्र जा पहुंचे। महाराज युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने बलरामजी को प्रणाम किया और शांत होकर खड़े रहे।

वे सभी डरते हुए, मन-ही-मन सोचने लगे कि बलराम जी न जाने यहां क्यों पधारे हैं?

उस समय भीमसेन और दुर्योधन, दोनों ही, हाथ में गदा लेकर एक दूसरे को जीतने के लिए क्रोध में भरकर भांति-भांति के पैंतरे बदल रहे थे।

बलराम जी ने कहा,

राजा दुर्योधन और भीमसेन! तुम दोनों ही वीर हो।

तुम दोनों में बल और पौरुष भी समान ही है।

मैं ऐसा समझता हूं कि भीमसेन में बल अधिक है और दुर्योधन ने गदा युद्ध में शिक्षा अधिक पाई है।

 इसलिए तुम लोगों जैसे समान बलशालियों में किसी एक की जय या पराजय नहीं होती दिखती...

...अतः तुम लोग व्यर्थ का युद्ध मत करो। अब इसे बंद कर दो।

शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

बलराम जी की बात दोनों के लिए ही हितकर थी, परंतु उन दोनों का वैर-भाव इतना बढ़ चुका था कि उन्होंने बलराम जी की बात नहीं मानी।

वे एक दूसरे की कटु वाणी और दुर्व्यवहारों का स्मरण करके उन्मत्त-से हो रहे थे।

भगवान बलराम जी ने निश्चय किया कि 

इनका प्रारब्ध ही ऐसा है। इसलिए उसके संबंध में विशेष आग्रह न करके वह द्वारका लौट गए।

*

द्वारका में

द्वारका में पहुंचने पर उग्रसेन आदि गुरुजनों तथा अन्य संबंधियों ने बड़े प्रेम से अगवानी कर, उनका स्वागत-सत्कार किया। द्वारका से बलराम जी पुनः नैमिषारण्य क्षेत्र में गये।

नैमिषारण्य में

ऋषियों ने बलराम जी के द्वारा बड़े प्रेम से सभी प्रकार के यज्ञ करवाए।

 परीक्षित!

सच पूछो तो जितने भी यज्ञ हैं, वे बलराम जी के ही अंग हैं।

इसलिए उनका यह यज्ञानुष्ठान लोक-संग्रह के लिए ही था।

 सर्वसमर्थ भगवान् बलराम ने उन ऋषियोंयों को विशुद्ध तत्वज्ञान का उपदेश दिया।

परीक्षित!

 जिससे वे लोग इस संपूर्ण विश्व को स्वयं में और स्वयं  को सारे विश्व में अनुभव करने लगे।

इसके पश्चात् बलरामजी ने अपनी पत्नी रेवती के साथ यज्ञांत-स्नान किया।

 *

शुकदेव जी ने कहा, 

परीक्षित!

भगवान बलराम स्वयं अनंत हैं।

उनका स्वरुप, मन और वाणी के परे है। उन्होंने लीला के लिए ही यह मनुष्यों-का-सा शरीर ग्रहण किया है।

*

बलराम चरित के

पिछले चार अंकों में,

हमने देखा कि 

किस प्रकार बलरामजी ने *स्वयं को महाभारत के युद्ध से विलग रखते हुए,

*तीर्थ यात्रा और पवित्र नदियों में स्नान करने,

 *नैमिषारण्य का पावन

सत्संग-सत्र लाभ करने,

*वहां और ऋषि-मुनियों द्वारा रोमहर्षण सूतजी को दिए गए वरदान का शोधन करने, 

(ऋषि-मुनियों ने रोमहर्षण सूतजी को सत्र समाप्त होने तक के लिए, शारीरिक कष्टों से रहित आयु प्रदान की थी। और कहा गया है कि हरि अनन्त, हरि कथा अनंता! सो, सूतजी की कष्ट रहित आयु भी अनन्त ही हो जाती? अस्तु।)

*उग्रश्रवा सूतजी को उनके पिता के स्थान पर व्यासपीठ (गद्दी) प्रदान करने,

*यज्ञ एवं सत्संग सत्रों को अपवित्र करने वाले बलव्ल का वध करने 

तथा

*साधारण मनुष्यों की भांति अपने पापों का प्रायश्चित करने की लीला करते हुए लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के लीलासहचर भगवान श्री बलरामजी ने

लोक शिक्षण हेतु अपने जीवन के द्वारा एक आदर्श स्थापित किया है।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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