खग्रास सूर्यग्रहण, समन्तपंचक तीर्थ
खग्रास सूर्यग्रहण
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
समन्तपंचक तीर्थ
शुकदेव
जी ने कहा,
परीक्षित!
ज्योतिषियों के द्वारा काल
गणना के अनुसार होने
वाले खग्रास सूर्यग्रहण का पता मनुष्यों
को पहले से ही चल
गया था।
इसलिए सभी लोग अपनेे-अपने कल्याण के उद्देश्य से
पुण्य कमाने कुरुक्षेत्र स्थित समन्त-पंचक तीर्थ में आए।
समन्त-पंचक वह क्षेत्र है,
जहां शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ परशुरामजी ने समूची पृथ्वी
को क्षत्रियहीन करके, राजाओं के रुधिर से
पांच बड़े-बड़े कुंड भर दिए थे।
अपने
पाप की निवृत्ति के
लिए प्रायश्चित हेतु भगवान परशुराम ने इस क्षेत्र
में यज्ञ किया था।
तीर्थस्नान
और सुहृदों से भेंट
परीक्षित! इस महान अवसर
पर भारतवर्ष के सभी प्रांतों
की जनता कुरुक्षेत्र आई थी।
उनमें
अक्रूर, वसुदेव, उग्रसेन आदि वरिष्ठजनों के साथ गद,
प्रद्युम्न, साम्ब आदि यदुवंशी भी पधारे थे।
उन्होंने
व्रत-उपवास रखा हुआ था।
ग्रहण
का मोक्ष हो जाने पर
सभी ने परशुरामजी के
बनाए हुए कुण्ड में विधिपूर्वक स्नान किया, ब्राह्मणों को भोजन कराया,
गौओं का दान किया,
ब्राह्मणों की अनुमति से
स्वयं भोजन किया और शीतल छाया
युक्त वृक्षों के नीचे अपना-अपना डेरा डाल कर ठहर गए।
परीक्षित!
जब
यदुवंशीयों विश्राम कर लिया तब
उन्होंने अपने सुहृदों
और संबंधी राजाओं से भेंट-मिलाप
आरंभ किया। वहां मत्स्य, मद्र, उशीनर, कोसल, विदर्भ, कुरु, सृंजय, कांबोज, कैकय, कुंति, आनर्त, केरल एवं अन्य कई देशों
के मित्र एवं शत्रुपक्ष के सैकड़ों नरपति
आए हुए थे। इनके अतिरिक्त यदुवंशियों के परम हितैषी
बंधु नंद आदि गोप तथा भगवान के दर्शन के
लिए चिरकाल से उत्कण्ठित गोपियां
भी आई हुई थीं।
वे
सभी, कुरुक्षेत्र में ग्रहण के उपरांत, शुभ
स्नान करने के पश्चात अपने-अपने स्वजनों और प्रियजनों से
मिल रहे थे।
कुन्ती
और वसुदेव
उस
समय कुंती ने वसुदेवजी से
कहा, "भैया! मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूं। मेरी एक भी इच्छा
पूरी न हुई।
आप
जैसे साधु-स्वभाव सज्जन भाई, आपत्ति के समय भी
मेरी सुधि न लें! इससे
बढ़कर दु:ख की
क्या बात हो सकती है"?
भैया!
विधाता
जिसके दक्षिण नहीं होता, उसे स्वजन-संबंधी, पुत्र और माता-पिता
भी भूल जाते हैं। इसमें आप लोगों का
कोई दोष नहीं है...
...इस
पर वसुदेवजी ने कहा, बहन!
उलाहना
मत दो।
हमें
अलग न मानो?
सभी
मनुष्य दैव के खिलौने हैं।
यह संपूर्ण लोक ईश्वर के वश में
रहकर कर्म करता है और उसके
फल भोगता है। कंस से सताए जाकर,
हम लोग इधर-उधर अनेक दिशाओं में भाग गए थे।
अभी
कुछ दिन पहले ही ईश्वर कृपा
से हम पुनः अपना
स्थान प्राप्त कर सके हैं।
राम-कृष्ण और नंद-यशोदा
जब
नंद बाबा को पता चला
कि यदुवंशी कुरुक्षेत्र में आए हुए हैं,
तब वे गोपों को
अपने साथ लेकर, अपने प्रिय पुत्र श्रीकृष्ण-बलराम आदि को देखने के
लिए वहां आए।
प्रेम और आनंद से
विह्वल होकर, वसुदेवजी ने नन्दजी को
हृदय से लगा लिया।
उन्हें
सारी पुरानी घटनाएं स्मरण हो आईं...
...किस
तरह उन्होंने अपने पुत्र को गोकुल में
ले जाकर नंदजी के घर रख
दिया था, कंस किस प्रकार उन्हें सताता था आदि।
भगवान
श्रीकृष्ण और बलरामजी ने
वहां आकर माता यशोदा और पिता नंदजी
के हृदय से लगकर उनके
चरणों में प्रणाम किया। उस समय, प्रेम
के उद्रेक से दोनों भाइयों
का गला रूंध गया और वे कुछ
भी नहीं बोल सके।
अपने
पुत्रों से मिलकर, यशोदाजी
और नंदबाबा का चिरकाल तक
उनसे नहीं मिलने का जो दुख
था, वह सब मिट
गया।
उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को अपनी गोद
में बिठा लिया और उनका प्रगाढ़
आलिंगन किया।
यशोदा
और रोहिणी-देवकी
देवकी
और रोहिणी ने
बृजेश्वरी
यशोदाजी को अपने अंक
में भर लिया।
वे
यशोदाजी से कहने लगीं,
यशोदा रानी! आपने और ब्रजेश्वर नंदजी
ने हमारे साथ जो मित्रवत् व्यवहार
किया है, उसका बदला हम किसी भी
प्रकार नहीं चुका सकते।
देवि
! जिस समय बलराम और श्रीकृष्ण ने
अपने माता-पिता को देखा भी
नहीं था, और इनके पिता
ने धरोहर के रूप में
इन्हें आप दोनों के
पास रख छोड़ा था,
उस समय आपने इन दोनों की
इस प्रकार रक्षा की-
जैसे पलकें नेत्रों की रक्षा करती
हैं। आप लोग सचमुच
परम संत हैं।
यदुवंशियों
के साथ कुरुवंशियों और अन्य राजाओं
की भेंट
ग्रहण
स्नान के लिए जितने
भी राजा आए हुए थे,
वसुदेव,
उग्रसेन आदि यदुवंशियों ने सभी का
खूब सम्मान-सत्कार किया।
वे
सभी भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन पाकर
परमानंद और परम शांति
का अनुभव करने लगे।
परीक्षित!
भीष्म
पितामह, द्रोणाचार्य, धृतराष्ट्र, विदुर, (दुर्योधन आदि अपने पुत्रों के साथ) गांधारी,
अपनी पत्नियों के साथ युधिष्ठिर
आदि पाण्डव, कुंती, सृंजय, कृपाचार्य, कुंतिभोज, विराट, भीष्मक नग्नजित्, पुरुजित्, द्रुपद्, शल्य, धृष्टकेतु, काशी-नरेश, दमघोष, विशालाक्ष, मिथिला-नरेश, मद्र-नरेश, केकय-नरेश, युधामन्यु, सुशर्मा, बाह्लीक और उनके पुत्र
आदि युधिष्ठिर के अनुयायी राजा...
भगवान
श्रीकृष्ण और उनकी रानियों
को देखकर वे सभी अत्यंत
विस्मित हुए।
उन्होंने
यदुवंशियों की प्रशंसा की।
उन लोगों ने उग्रसेनजी को
संबोधित करके कहा- भोजराज! उग्रसेन जी, इस जगत में
आप लोगों का जीवन ही
सफल है।
धन्य
है! धन्य है!
क्योंकि
जिन श्रीकृष्ण का दर्शन बड़े-बड़े योगियों के लिए भी
दुर्लभ है, उनको आप लोग निरंतर
देखते रहते हैं।
गोपियों
के साथ श्रीकृष्ण की भेंट
शुकदेव
जी ने कहा,
परीक्षित!
गोपियों
के परम प्रियतम, जीवन सर्वस्व श्रीकृष्ण ही थे। उन्हीं प्रेम मूर्ति गोपियों को आज बहुत
दिनों के बाद भगवान
श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ।
उनके
मन में इसके लिए कितनी लालसा थी इसका अनुमान
भी नहीं किया जा सकता।
परीक्षित!
कहां
तक कहूं? गोपियां भगवान् श्रीकृष्ण के दर्शन करके
उस भाव को प्राप्त हो
गईं-
जो
नित्य-निरंतर अभ्यास करने वाले योगियों के लिए भी
अत्यंत दुर्लभ है।
जब
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि
गोपियां मुझसे तादात्म्य को प्राप्त हो-
मुझसे एक हो रही
हैं, तब वे एकांत
में उनके पास गए और उनका
कुशल-मंगल पूछा।
भगवान
श्रीकृष्ण ने हंसते हुए
कहा,
सखियों!
हम
लोग अपने स्वजन-संबंधियों का काम करने
के लिए ब्रज से बाहर चले
आए और इस प्रकार
तुम्हारे जैसी प्रेयसियों को छोड़कर हम
शत्रु का विनाश करने
में ही उलझे रहे...
...इसी
में बहुत से दिन बीत
गये...
क्या
कभी तुम लोग हमारा स्मरण भी करती हो?
मेरी
प्यारी गोपियों!
कहीं
तुम लोगों के मन में
यह आशंका तो नहीं है
कि मैं अकृतज्ञ हूं और ऐसा समझकर,
तुम लोग हमसे बुरा तो नहीं मानने
लगी हो?
निःसंदेह भगवान ही प्राणियों के
संयोग और वियोग के
कारण है।
भगवान
ने इस प्रकार गोपियों
से मधुर-मधुर बातें कहते हुए उन्हें तृप्त किया और अध्यात्म ज्ञान
की शिक्षा से शिक्षित किया।
उस
उपदेश के बारम्बार स्मरण
से गोपियों का
जीव-कोश (देहबोध) नष्ट हो गया और
वे भगवान से एक हो
गईं- भगवान को ही सदा-सर्वदा के लिए प्राप्त
हो गईं।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
ॐ
नमो भगवते वासुदेवाय।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें