सुभद्रा हरण
सुभद्रा हरण
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शुकदेव
जी ने कहा,
परीक्षित!
एक
बार अर्जुन तीर्थयात्रा के लिए प्रभास
क्षेत्र पहुंचे।
वहां
उन्होंने सुना कि बलरामजी अपनी
बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन
के साथ करना चाहते हैं और इस विषय
में (अर्जुन के मामा) वसुदेवजी
और श्रीकृष्ण आदि सहमत नहीं हैं।
तब
सुभद्रा को पाने के
लिए अर्जुन ने त्रिदण्डी वैष्णव
का वेश धारण किया और वे प्रभास
क्षेत्र से द्वारका जा
पहुंचे।
सुभद्रा को प्राप्त करने
के लिए वर्षाकाल में चार महीने तक (चतुर्मास में) वे वहीं रहे।
बलरामजी ने और द्वारका
वासियों ने वैष्णव वेशधारी
अर्जुन का बहुत सम्मान
किया।
उन्हें
यह नहीं पता चला कि ये अर्जुन
हैं।
*
एक
दिन बलरामजी ने आतिथ्य के
लिए उन्हें निमंत्रित किया और वे उन्हें
अपने घर ले आए।
त्रिदण्डी वेशधारी अर्जुन को बलराम जी
ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक भोजन सामग्री निवेदित की।
अर्जुन ने बड़े प्रेम
से भोजन किया।
भोजन
के समय ही अर्जुन ने
सुभद्रा को देखा। सुभद्रा
ने भी अर्जुन को
देखा और अर्जुन-सुभद्रा
का एक-दूसरे के
प्रति परस्पर आकर्षण हुआ।
सुभद्रा
ने अपना हृदय उन्हें समर्पित कर दिया और
मन ही मन उन्हें
अपना पति बनाने का निश्चय किया।
इधर अर्जुन भी सुभद्रा को
प्राप्त करने की कामना से
उनका ही चिंतन करने
लगे।
*
एक दिन जब
सुभद्राजी देव-दर्शन के लिए रथ
पर सवार होकर द्वारका-दुर्ग से बाहर निकलीं
उसी समय महारथी अर्जुन ने देवकी-वसुदेव
और श्रीकृष्ण की अनुमति से
सुभद्रा का हरण कर
लिया।
रथ पर सवार
होकर वीर अर्जुन ने, उन्हें रोकने के लिए जितने
सैनिक आगे आए उन्हें मार-पीट कर भगा दिया।
उस
समय सुभद्रा के रक्षक और
साथी रोते हुए बलरामजी के पास पहुंचे।
बलरामजी
यह समाचार सुनकर बहुत क्रोधित हुए किंतु भगवान श्रीकृष्ण तथा अन्य सुहृद और संबंधियों ने
उनके पैर पकड़कर उन्हें समझाया-बुझाया तब वे शांत
हुए और प्रसन्न होकर
वर-वधु के लिए बहुत
सी भेंट सामग्री भेजी।
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ॐ
नमो भगवते वासुदेवाय।

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