सुदामा चरित-५ ब्राह्मणदेव पर कृपा
भागवत के मोती-१३३
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सुदामा चरित-५
ब्राह्मणदेव पर कृपा
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(आज का अंक साधकों को समर्पित है।)
भक्ताय चित्रा भगवान् हि सम्पदो राज्यं विभूतीर्न समर्थयत्यज:। अदीर्घबोधाय विचक्षण: स्वयं पश्यन् निपातं धनिनां मदोद्भवम्।।३७।।
(१०/८२)
भगवान श्रीकृष्ण धन, राज्य
संपत्ति आदि के दोष जानते हैं।
वे देखते हैं कि
बड़े-बड़े धनपतियों का,
धन और ऐश्वर्य के मद से पतन हो जाता है।
इसलिए, वे अपने अदूरदर्शी भक्त को,
उसके मांगते रहने पर भी तरह-तरह की संपत्ति,
राज्य और ऐश्वर्य आदि नहीं देते।
यह उनकी बड़ी कृपा है।
दिष्ट्या व्यवसितं भूपा भवन्त ऋतभाषिण:।श्रियैश्वर्यमदोन्नाहं पश्य पश्य उन्मादकं नृणाम्।। १९।। हैहयो नहुषो वेनो रावणो नरकोऽपरे। श्रीमदाद् भ्रंशिता: स्थानाद् देवदैत्यनरेश्वरा:।।२०।।
(१०/७३)
भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध के कारावास से मुक्त किए बीस हजार राजाओं से कहा था-
मैं देखता हूं कि धन-संपत्ति और ऐश्वर्या मद से चूर होकर बहुत से लोग उच्छृंखल और मतवाले हो जाते हैं।
हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन, राजा नहुष, राजा वेन, रावण नरकासुर आदि अनेकों देवता, दैत्य और नरपति श्रीमद् (धन-वैभव)के कारण अपने स्थान से, पद से, च्युत हो गए।
इसलिए तुम लोग अपनी वंश परंपरा की रक्षा के लिए संतान उत्पन्न करो- भोग के लिए नहीं और प्रारब्ध के अनुसार जन्म-मृत्यु, सुख-दुख, लाभ-हानि जो कुछ भी प्राप्त हों उन्हें सामान भाव से मेरा प्रसाद समझकर सेवन करो और अपना चित्त मुझ में लगाकर जीवन व्यतीत करो।
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उन दरिद्र ब्राम्हण (सुदामा) ने भगवान् श्रीकृष्ण से अपने लिए धन-संपत्ति आदि कुछ भी नहीं मांगा।
उल्टे वे अहोभाव से भरे हुए अपने घर वापस लौट आए कि भगवान् ने उनके मंगल के लिए ही उन्हें धन-वैभव से दूर रखा हुआ है।
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भगवान् अंतर्यामी हैं।
श्रीमद्भागवत में लिखा है,
जब वे ब्राह्मण देवता अपने घर वापस आए, तब उन्होंने पाया की त्रैलोक्य के स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें एक मुट्ठी चिवड़े के बदले में ऐसा वैभव दे रखा है जैसा कदाचित देवराज इंद्र को प्राप्त होगा!
"तथापि भगवान् द्वारा प्रदत्त यह वैभव बंधंन का कारक कदापि नहीं है"।
यथा,
यान् यान् कामयसे कामान् मय्यकामाय भामिनि। सन्ति ह्येकान्तभक्तायास्तव कल्याणि नित्यदा।।५०।।
(१०/६०)
अध्याय साठ में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणीजी से कह रहे हैं- सुंदरी!
तुम मेरी अनन्य प्रेयसी हो। मेरे प्रति तुम्हारा अनन्य प्रेम है। तुम मुझसे जो-जो अभिलाषाएं करती हो, वे तो तुम्हें सदा-सर्वदा प्राप्त ही हैं। और यह बात भी है कि मुझसे की हुई अभिलाषा "सांसारिक कामनाओं के समान बंधन में डालने वाली नहीं होतीं, बल्कि वे समस्त कामनाओं से मुक्त कर देती हैं।"
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उन ब्राम्हण देवता ने भगवान से तरह-तरह की संपत्ति, राज्य और ऐश्वर्य नहीं मांगे। अनायास ही इतना सब कुछ प्राप्त करके भी, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य भक्ति की ही अभिलाषा की...
...उन्हीं के ध्यान के आवेग से उनकी अविद्या की गांठ कट गई और उन्हें भगवान का परमधाम प्राप्त हो गया।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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जवाब देंहटाएंऊं नमो भगवते वासुदेवाय नमः
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंअतिसुंदर
जवाब देंहटाएं🙏🙏🙏🙏
जवाब देंहटाएंbeautiful
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