शिवजी और वृकासुर
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पिछले अंक में हमने पढ़ा कि महाराज परीक्षित के प्रश्न के उत्तर में शुकदेव जी ने भगवान विष्णु और उनके ही विभिन्न रुपों- भगवान शंकर और ब्रह्माजी आदि की उपासनाओं के भेद को स्पष्ट किया।
आज के अंक में हम देखेंगे कि शीघ्रातिशीघ्र अपने भक्तों पर प्रसन्न अथवा क्रोधित होने वाले ब्रह्माजी अथवा भगवान शंकर की धन अथवा भोगों की कामना से की गई उपासना और उसके परिणाम से संबंधित एक कथा।
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वृकासुर
एक बार शकुनि के पुत्र वृकासुर ने नारद जी से पूछा, ब्रह्मर्षि!
ब्रह्माजी, भगवान् शंकर और भगवान् श्रीहरि इन तीनों में से झटपट प्रसन्न होने वाले देवता कौन हैं?
मैं जिसकी उपासना करूं?
इस पर ब्रह्मर्षि नारदजी ने कहा, निश्चय ही रावण और बाणासुर पर क्षण-भर में ही प्रसन्न होने वाले भगवान शंकर हैं।
अतः तुम उन्हीं की उपासना करो!
तब वृकासुर केदार क्षेत्र में गया और अग्नि को भगवान् शंकर का मुख मानकर,
अपने शरीर के अंग काट-काट कर उसमें हवन करने लगा।
इस प्रकार छः दिन तक उपासना करने पर भी जब उसे भगवान् शंकर के दर्शन नहीं हुए, तब उसे अत्यंत दु:ख हुआ।
सातवें दिन केदार तीर्थ में स्नान करके, उसने कुल्हाड़ी से अपने मस्तक को काटकर हवन करना चाहा।
परीक्षित!
जैसे इस जगत में दु:खवश आत्महत्या करने वाले को, करुणावश हम लोग बचा लेते हैं; वैसे ही, भगवान् शंकर ने अग्निकुंड से प्रकट होकर वृकासुर को बचा लिया। उन्होंने आत्मघात को उद्यत् वृकासुर के दोनों हाथ पकड़ लिए और कहा,
मैं तो अपने शरणागत भक्तों द्वारा थोड़ा-सा जल चढ़ाने पर ही प्रसन्न और संतुष्ट हो जाता हूं। फिर व्यर्थ में ही तुम अपने शरीर को कष्ट क्यों दे रहे हो?
यह कहकर उन्होंने वृकासुर से कुल्हाड़ी छीन ली।
भगवान् भोलेनाथ के स्पर्श से वृकासुर के सभी अंग पूर्व की भांति स्वस्थ हो गये।
भगवान् शिव ने कहा,
बस करो! बहुत हुआ!
मैं तुम पर प्रसन्न हूं और तुम्हें वर देना चाहता हूं। तुम मुंह मांगा वर मांग लो।
वृकासुर ने कहा,
मैं जिसके सिर पर हाथ रख दूं, वह तत्क्षण मर जाए।
परीक्षित!
उसकी याचना सुनकर भगवान रुद्र पहले तो कुछ अनमने-से हो गए।
फिर हंसकर कह दिया,
अच्छा, ऐसा ही हो !
ऐसा वर देकर, उन्होंने मानों सांप को अमृत पिला दिया?
भगवान शंकर के इस प्रकार का वर देने पर वृकासुर के मन में पार्वतीजी को पाने की लालसा हो आई।
उस दुष्ट ने शंकरजी के वर की परीक्षा के लिये, उन्हीं के सिर पर हाथ रखा चाहा।
संकट में भोलेनाथ
अब तो शंकर जी अपने दिये हुए वरदान से ही भयभीत हो गए और वहां से डरकर भागे...
...वे जहां भी जाते, वृकासुर उनका पीछा करता हुआ वहीं पहुंच जाता।
जब उन्हें तीनों लोकों में कोई सुरक्षित जगह नहीं मिली, तब वे भगवान श्रीहरि के वैकुंठ में जा पहुंचे।
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सभी कुछ जानने वाले भगवान श्रीहरि ने जब देखा, भगवान शंकर का पीछा करता हुआ, वृकासुर उसी ओर आ रहा है तब भगवान ने ब्रह्मचारी का वेश धारण किया और वह उसी ओर चलने लगे जिस ओर से वृकासुर दौड़ा चला आ रहा था...
श्रीहरि द्वारा शिवजी का संकट-मोचन
ब्रह्मचारी वेशधारी भगवान श्रीहरि ने वृकासुर से कहा,
शकुनिनंदन वृकासुर जी! आप बहुत ही थके हुए से जान पड़ते हैं, क्या आप बहुत दूर से दौड़े चले आ रहे हैं?
तनिक विश्राम कर लीजिए! क्योंकि यह शरीर ही समस्त सुखों की जड़ है, और इसी से सारी कामनाएं पूरी होती हैं। इसलिए इसे अधिक कष्ट नहीं देना चाहिए।
क्या इस समय, मैं आपकी कुछ सहायता कर सकता हूं? क्योंकि इस संसार में लोग, थोड़ी-सी सहायता से ही बहुत-सारे काम बना लिया करते हैं!
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शुकदेवजी ने कहा,
परीक्षित!
भगवान के इस प्रकार पूछने पर, वृकासुर ने अपनी तपस्या, वरदान-प्राप्ति और भगवान् शंकरजी का पीछे करने की सारी कथा
आरंभ से अंत तक भगवान् श्रीहरि को कह सुनाई।
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कथा सुन कर,
भगवान ने कहा,
अच्छा तो ऐसी बात है?
तब तो भाई!
हम उस शंकर की बात पर विश्वास नहीं करते!
क्या आप को नहीं पता?
दक्ष प्रजापति के श्राप से उस(शिवजी)का पिशाच-भाव हो गया है।
आजकल वही भूत-प्रेत और पिशाचों का सम्राट है !
दैत्यराज वृकासुर!
आप इतने बड़े होकर भी ऐसी छोटी-छोटी बातों पर कैसे विश्वास कर लेते हैं?
यदि आप अभी भी उसे जगत-गुरु मानते हैं और उसकी बात पर विश्वास करते हैं तो झटपट अपने सिर पर हाथ रखकर परीक्षा कर लीजिए...
और यदि उस शंकर की बात असत्य निकले तो उसे तुरंत ही मार डालिए-
जिससे वह, फिर कभी- किसी-से झूठ न बोल सके!
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शुकदेव जी ने कहा,
हे परीक्षित!
भगवान की ऐसी मोहक और मधुर बातें सुनकर, वृकासुर की विवेक-बुद्धि जाती रही। और उस दुर्बुद्धि ने भूलवश अपने ही सिर पर हाथ रख लिया...
उसी क्षण मानों धरती पर वज्रपात हुआ हो...
...वृकासुर का सिर फट गया।
वह वहीं गिर पड़ा और उसके प्राण-पखेरू उड़ गये।
इस प्रकार भगवान् शंकर, श्रीहरि की कृपा से भयहीन होकर उस संकट से मुक्त हो गए।
शिवजी द्वारा श्रीहरि की स्तुति
भगवान शंकर ने कहा, देवाधिदेव! बड़े हर्ष की बात है कि इस दुष्ट को इसके पापों ने ही नष्ट कर दिया।
हे परमेश्वर! भला ऐसा कौन सा प्राणी है, जो महापुरुषों का अपराध करके कुशल रह सके?
फिर स्वयं जगतगुरु! विश्वेश्वर!
आपका अपराध करके तो कोई सकुशल रह ही कैसे सकता है?
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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