महर्षि भृगु और त्रिदेव
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
महर्षि भृगु और त्रिदेव
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
एक बार सरस्वती नदी के तट पर बड़े-बड़े ऋषियों और मुनियों ने एक महायज्ञ का आयोजन किया।
उनमें इस विषय पर वाद-विवाद होने लगा कि त्रिदेवों में सबसे बड़ा कौन है!
हे परीक्षित!
मनुष्यों का संशय दूर करने के लिए उन्होंने एक युक्ति की रचना की ओर उसके क्रियान्वयन हेतु महर्षि भृगु को तैयार किया।
*
उन लोगों ने यह बात जानने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और शिव की परीक्षा लेने के उद्देश्य से ब्रह्माजी के पुत्र भृगुजी को उन तीनों देवताओं के पास भेजा।
पिता ब्रह्माजी के पास
महर्षि भृगुजी सबसे पहले ब्रह्माजी की सभा में गये। उन्होंने ब्रह्माजी के धैर्य की परीक्षा करने के लिये-
न तो उन्हें नमस्कार किया और न ही उनकी स्तुति की।
इस पर उन्हें यह अनुभव हुआ कि ब्रह्माजी अपने तेज से दहकने लगे और उन्हें क्रोध आ गया...
...परंतु दूसरे ही क्षण, जब समर्थ ब्रह्माजी ने देखा कि यह तो मेरा पुत्र ही है; तब अपने मन में उठे क्रोध को, भीतर-ही-भीतर उन्होंने ठीक उसी तरह विवेक-बुद्धि से दबा लिया-
जैसे कोई अरणि-मंथन से उत्पन्न अग्नि को जल से बुझा दे।
भ्राता शिवजी
वहां से महर्षि भृगु कैलाश में आ गये।
देवाधिदेव महादेव
भगवान् शंकरजी ने जब देखा कि उनके भ्राता भृगुजी पधारे हैं, तब उन्होंने आनंद-पूर्वक खड़े होकर उनके आलिंगन के लिए अपनी भुजाएं फैला दीं...
...परंतु महर्षि भृगुजी ने उनके आलिंगन को स्वीकार नहीं किया और उनसे कहा,
तुम लोक और वेद की मर्यादा का उल्लंघन करते हो! इसलिए, मैं तुमसे नहीं मिलता!
भृगुजी की यह बात सुनकर, भगवान् शंकर, क्रोध के मारे तिलमिला उठे।
उनकी आंखें चढ़ आईं। उन्होंने अपना त्रिशूल उठाकर महर्षि भृगु को मारना चाहा...
...परंतु भगवती सतीजी ने उनके चरणों पर गिरकर बहुत अनुनय-विनय की और किसी प्रकार उनका क्रोध शांत किया।
श्रीहरि के निवास पर
अब महर्षि भृगुजी
भगवान् विष्णु के निवास स्थान वैकुंठ में गये।
उस समय भगवान विष्णु लक्ष्मीजी की गोद में अपना सिर रखकर लेटे हुए थे।
भृगुजी ने जाकर उनके वक्ष:स्थल पर, कसकर, एक लात जमा दी...
...भक्तवत्सल भगवान विष्णु लक्ष्मीजी के साथ उठ बैठे! और झटपट अपनी शैय्या से नीचे उतरकर, मुनि को सिर झुका कर प्रणाम किया। भगवान् विष्णु ने कहा,
ब्रह्मन्!
आपका स्वागत है! आप इस आसन पर बैठकर कुछ क्षण विश्राम कीजिये।
हे प्रभु!
मुझे आपके शुभागमन का पता नहीं था इसी से मैं आपकी अगवानी नहीं कर सका।
आप कृपा करके मेरा यह अपराध क्षमा कीजिये।
हे महामुने! आपके चरणकमल अत्यंत कोमल हैं। ऐसा कह कर, भगवान ने भृगुजी के चरणों को अपनी गोद में ले लिया और उन्हें सहलाने लगे।
भगवान् ने कहा,
महर्षि!
आपके चरणों का जल,
तीर्थों को भी तीर्थ बनाने वाला है। आप उनसे वैकुंठलोक, मुझे और मेरे भीतर रहने वाले लोकपालों को पवित्र कीजिये।
हे भगवन्! आपके चरणकमलों के स्पर्श से मेरे समस्त पाप धुल गये। आज मैं लक्ष्मी का एकमात्र आश्रय हो गया। अब आपके चरणों से चिन्हित मेरे वक्ष:स्थल पर लक्ष्मी सदा-सर्वदा निवास करेंगी।
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
भगवान के मृदु-वचन सुनकर, महर्षि भृगुजी परमसुखी और तृप्त हो गए।
भक्ति के उद्रेक से उनका गला भर आया और उनकी आंखों में आंसू छलक आए।
*
हे परीक्षित!
भृगुजी वहां से लौटकर सरस्वती तट के यज्ञ स्थल में आए और अपना अनुभव समस्त ऋषि-मुनियों को कह सुनाया।
तब उन सभी का समस्त संदेह दूर हो गया और एक स्वर में उन्होंने भगवान विष्णु को ही सर्वश्रेष्ठ मान लिया।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

Very Nice 👍
जवाब देंहटाएं🙏🙏
हटाएं