अर्जुन का मानमर्दन
अर्जुन का मानमर्दन
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शुकदेवजी ने कहा,
परीक्षित!
द्वारकापुरी में एक ब्राम्हणी के गर्भ से एक पुत्र पैदा हुआ परंतु पृथ्वी का स्पर्श होते ही उसकी मृत्यु हो गई।
ब्राह्मण ने उस मृत बालक का शरीर राजमहल के द्वार पर रख दिया और अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगा। ब्राह्मण कह रहा था-
इसमें संदेह नहीं कि ब्राह्मणद्रोही, धूर्त, कृपण और विषयी राजा के कर्मदोष से ही मेरे बालक की मृत्यु हुई है। जो राजा हिंसापरायण, दु:शील और अजितेन्द्रिय होता है, उसे राजा मानकर सेवा करने वाली प्रजा दरिद्र होकर सदा ही दु:ख भोगती रहती है और उसके सम्मुख सदैव संकट आते ही रहते हैं।
इस प्रकार
एक-के-बाद-एक
आठ मृत बालक, वह ब्राह्मण, राजमहल के द्वार पर, डालता गया और प्रत्येक समय यही बातें दुहराता जाता।
जिस समय उस ब्राह्मण ने नवें बालक के मृत शरीर को डालकर, यही बात दुहराई-
उस समय वहां अर्जुन उपस्थित थे।
उस ब्राह्मण की बात सुनकर अर्जुन ने कहा,
ब्रह्मन्! आपके निवास स्थान द्वारका में कोई धनुष-धारी क्षत्रिय नहीं हैं क्या? ऐसा मालूम होता है कि ये "यदुवंशी" ब्राह्मण हैं! और ये सभी, प्रजापालन का परित्याग करके किसी यज्ञ में बैठे हुए हैं...
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
उस समय भगवान श्रीकृष्ण स्वयं वहां उपस्थित थे।
फिर भी,
उस अर्जुन ने आगे कहा,
...जिनके राज्य में धन, स्त्री अथवा पुत्रों से वियुक्त होकर, ब्राह्मण दुखी होते हैं, वे क्षत्रिय नहीं हैं! क्षत्रिय-वेश में उदर-पोषण करने वाले "नट" हैं। उनका जीवन व्यर्थ है...
...मैं समझता हूं कि आप स्त्री-पुरुष अपने पुत्र की मृत्यु से दीन हो रहे हैं, मैं आपकी संतान की रक्षा करूंगा। यदि मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी न कर सका तो अग्नि में कूदकर जल मरूंगा। इससे मेरे पाप का प्रायश्चित हो जाएगा।
तब उस ब्राह्मण ने कहा, "अर्जुन! यहां बलराम जी भगवान श्रीकृष्ण, धनुर्धर-शिरोमणि प्रद्युम्न और अद्वितीय योद्धा अनिरुद्ध भी... जब मेरे बालकों की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं, जगदीश्वरों के लिए भी यह कार्य कठिन हो रहा है, तब तुम इसे कैसे करना चाहते हो? सचमुच यह तुम्हारी मूर्खता है! हम तुम्हारी इस बात पर बिलकुल विश्वास नहीं करते।
तब अर्जुन ने कहा,
ब्रह्मन्!
मैं बलराम, श्रीकृष्ण अथवा प्रद्युम्न नहीं हूं। मैं अर्जुन हूं। जिसका गाण्डीव विश्व प्रसिद्ध है। आप मेरे बल और पौरुष का तिरस्कार मत कीजिए। आप नहीं जानते मैं... अपने पराक्रम से भगवान शंकर को संतुष्ट कर चुका हूं। मैं आपसे अधिक क्या कहूं- युद्ध में साक्षात् मृत्यु को भी जीत कर आपकी सन्तान ला दूंगा।
*
अर्जुन के आश्वासन पर वह ब्राह्मण संतुष्ट होकर अपने घर लौट आया।
प्रसव का समय निकट आने पर ब्राह्मण आतुर होकर अर्जुन के पास आया और उसने कहा,
इस बार तुम मेरे बच्चे को मृत्यु से बचा लो!
यह सुनकर अर्जुन ने शुद्ध जल से आचमन किया तथा भगवान शंकर को नमस्कार किया।
फिर अपने दिव्य अस्त्रों का स्मरण करके अपने धनुष गाण्डीव पर प्रत्यंचा चढ़ाकर, उसने प्रसूतिका-गृह के ऊपर-नीचे और अगल-बगल से बाणों का एक पिंजरा-सा बना दिया।
यथा समय ब्राह्मणी के गर्भ से एक शिशु पैदा हुआ जो बार-बार रो रहा था।
परंतु देखते-ही-देखते वह सशरीर आकाश में अंतर्ध्यान हो गया।
*
अब वह ब्राह्मण
भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही अर्जुन की निंदा करने लगा।
उसने कहा,
मेरी मूर्खता तो देखो? मैंने इस नपुंसक की डींग भरी बातों पर विश्वास कर लिया। जिसे प्रद्युम्न, अनिरुद्ध यहां तक कि बलरामजी और भगवान श्रीकृष्ण भी नहीं बचा सके- भला उसकी रक्षा करने में और कौन समर्थ होगा? अपने मुंह अपनी बड़ाई करने वाले इस मिथ्यावादी अर्जुन को धिक्कार है! अर्जुन के इस धनुष को भी धिक्कार है। इस दुर्बुद्धि को तो देखो- यह मूर्खतावश उस बालक को लौटा लाना चाहता है, जिसे प्रारब्ध ने हमसे अलग कर दिया है!
*
ब्राह्मण के इस प्रकार बुरा-भला कहने पर अर्जुन ने अपने योगबल से यमराज की संयमनीपुरी में जाकर उस बालक का पता किया।
वहां न मिलने पर वह क्रमशः शस्त्र लेकर इंद्र, अग्नि, निर्ऋति, सोम, वायु और वरुण आदि के लोकों में
अतल-आदि निचले और
स्वर्ग आदि ऊंचे लोकों में जाकर उस बालक को ढूंढने लगे...
...किंतु कहीं भी उस ब्राह्मण के बालक का पता न लगने पर अर्जुन ने अग्नि में प्रवेश करने की तैयारी की।
परंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ऐसा करने से रोक लिया और उसे आश्वस्त किया।
भगवान ने कहा,
हे अर्जुन!
तुम अपना तिरस्कार मत करो मैं तुम्हें ब्राह्मण के सभी बालक अभी दिखाए देता हूं। इससे जो लोग आज तुम्हारी निंदा कर रहे हैं, वही हमारी निर्मल-कीर्ति की स्थापना करेंगे।
*
शुकदेव जी ने कहा,
हे परीक्षित!
सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर गाण्डीवधारी अर्जुन का सारा अभिमान चूर-चूर हो चुका था!
*
(अगले अंक में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन द्वारा ब्राह्मण के समस्त मृत बालकों को लौटा कर लाने की कथा।)
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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