भूमा-पुरुष के दर्शन
भूमा-पुरुष के दर्शन
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
पिछले अंक में हमने पढ़ा कि ब्राह्मण के नवजात बालक की रक्षा करने में असमर्थ अर्जुन, अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अग्निदाह करने के लिए प्रस्तुत हुआ किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उसे ऐसा करने से रोक लिया।
अब आगे।
*
परमधाम की यात्रा
भगवान श्रीकृष्ण ने हताश अर्जुन को समझाया-बुझाया और अपने दिव्य रथ पर सवार होकर पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान किया।
उन्होंने सप्त-पर्वतों सप्त-द्वीपों और सप्त-सिंधुओं को पार करके घोर अंधकार में प्रवेश किया।
परीक्षित!
वह अंधकार इतना सघन था कि उसमें शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नमक चारों अश्व अपने मार्ग को भूलकर इधर-उधर भटकने लगे।
भगवान श्रीकृष्ण ने तब सुदर्शन चक्र को अपने तेज से उनका मार्गदर्शन करने के लिए छोड़ दिया।
चारों अश्व सुदर्शन चक्र का अनुसरण करते हुए, लक्ष्य की ओर बढ़ने लगे।
सुदर्शन चक्र के द्वारा बतलाए हुए मार्ग से चलकर अंधकार की अंतिम सीमा पर पहुंचकर उस अंधकार के पार, पारावार- हित व्यापक परम ज्योति जगमगा रही थी।
उसे देख कर अर्जुन की आंखें चौंधिया गईं और उन्होंने विवश होकर अपने नेत्र बन्द कर लिये।
*
भूमा-पुरुष के दर्शन
इसके बाद भगवान के रथ ने दिव्य जलराशि में प्रवेश किया। वहां से होते हुए वे उस भवन में पहुंचे जहां भगवान शेषजी विराजमान थे।
उनके एक सहस्त्र फण थे और उनका संपूर्ण शरीर कैलाश के समान श्वेतवर्ण का था।
अर्जुन ने जब आंखें खोलीं तब उन्होंने देखा कि भगवान शेषनाग की सुखमय शैय्या पर भूमा-पुरुषोत्तम भगवान् अनन्त विराजमान हैं।
उनकी सुंदर आठ भुजाएं हैं, गले में कौस्तुभमणि है, वक्ष स्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह और वे वनमाला धारण किए हुए हैं।
नंद-सुनंद आदि उनके पार्षद, चक्र-सुदर्शन आदि मूर्तिमय आयुध तथा पुष्टि, श्री, कीर्ति और अजा ये चारों सिद्धियां ब्रह्मादि लोकपालों के अधीश्वर भगवान, की सेवा कर रही हैं।
*
परीक्षित!
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने ही रूप भगवान श्रीअनन्त को प्रणाम किया।
अर्जुन उनके दर्शन से कुछ भयभीत हो गए थे, श्रीकृष्ण के बाद उन्होंने भी उन्हें प्रणाम किया और वे दोनों ही हाथ जोड़कर खड़े हो गये। अब ब्रम्हादि लोकपालों के स्वामी भूमा-पुरुष ने मुस्कुराते हुए, गंभीर वाणी में कहा, कृष्ण और अर्जुन!
मैंने तुम दोनों को देखने के लिये ही ब्राह्मण के बालक अपने पास मंगा लिये थे। तुम दोनों ने धर्म की रक्षा के लिए मेरी कलाओं के साथ पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया है; पृथ्वी के भाररूपी दैत्यों का संहार करके शीघ्र ही तुम लोग पुन: मेरे पास लौट आओ। तुम दोनों ऋषिवर नर और नारायण हो। यद्यपि तुम पूर्णकाम और सर्वश्रेष्ठ हो, फिर भी जगत् की स्थिति और लोकसंग्रह के लिये धर्म का आचरण करो।
भूमा-पुरुष का आदेश प्राप्त करके श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भगवान को प्रणाम किया और ब्राह्मण के सभी बालकों को साथ लेकर वे उसी तरह वापस लौट आए जिस तरह वे वहां गए थे।
*
वापस द्वारका में
परीक्षित!
द्वारका में लौटकर भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने उन सभी ब्राह्मण पुत्रों को, जो अब बड़े-बड़े हो चुके थे, उनके पिता उस ब्राम्हण को सौंप दिया।
भगवान विष्णु के परमधाम को देखकर अर्जुन के आश्चर्य की सीमा न रही। उन्होंने ऐसा अनुभव किया कि
जीवों में जो कुछ भी बल और पौरुष है, वह सभी भगवान श्रीकृष्ण की कृपा का ही फल है।
परीक्षित!
भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर बहुत से अधर्मी राजाओं को स्वयं मार डाला और बहुतों को अर्जुन आदि के द्वारा मरवा कर धर्मराज युधिष्ठिर आदि धार्मिक राजाओं से अनायास ही सारी पृथ्वी में धर्म मर्यादा की स्थापना करा दी।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

इतनी सामान्य भाषा में लिख कर समझाने के लिए धन्यवाद। इस प्रसंग का ज्ञान नहीं था
जवाब देंहटाएं🙏 🙏
हटाएं