यदुवंश को ऋषियों का श्राप
यदुवंश को ऋषियों का श्राप
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शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण ने बलरामजी तथा अन्य यदुवंशियों के साथ मिलकर बहुत से दैत्यों का संहार किया।
कौरवों ने कपट पूर्ण जूए(द्युत-क्रीड़ा)से युद्ध किया , तरह-तरह के अपमानों से तथा द्रौपदी के केश खींचने आदि अत्याचारों से पांडवों को अत्यंत क्रोधित कर दिया था।
उन्हीं पांडवों को निमित्त बनाकर भगवान श्री कृष्ण ने दोनों पक्षों में एकत्र करते हुए बहुत सारे राजाओं को मरवा डाला
कौरवों और पांडवों में भी मार-काट मचाने वाला अत्यंत प्रबल कलह उत्पन्न करके पृथ्वी का बहुत सारा भार उतार दिया।
अपने बाहुबल द्वारा सुरक्षित यदुवंशियों के द्वारा पृथ्वी के भार-स्वरुप राजाओं और उनकी सेना का विनाश करके
भगवान् श्रीकृष्ण ने विचार किया कि
"पृथ्वी का बहुत सारा भार दूर हो जाने पर भी, वस्तुतः मेरी दृष्टि से वह अभी तक दूर नहीं हुआ है; क्योंकि अब तक अजेय यदुवंशी पृथ्वी पर अभी विद्यमान हैं। वे मेरे आश्रित हैं और अपने विशाल धन, बल और वैभव के कारण उच्छृंखल हो रहे हैं। अन्य किसी देवता आदि से भी इनकी पराजय नहीं हो सकती"।
"बांस के वन में परस्पर संघर्षण से उत्पन्न अग्नि के समान इस यदुवंश में भी परस्पर कलह खड़ा करके मैं शांति प्राप्त कर सकूंगा और इसके बाद ही अपने धाम में जाऊंगा"।
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शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
उस समय विश्वामित्र, असित
कण्व, दुर्वासा, अंगिरा, भृगु, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वशिष्ठ और नारद आदि बड़े-बड़े ऋषि द्वारका के पास ही पिण्डारक क्षेत्र में जाकर निवास करने लगे थे।
एक दिन यदुवंश के कुछ उद्दंड कुमार खेलते-खेलते उनके पास जा पहुंचे। उन्होंने जाम्बवती नंदन साम्ब को स्त्री के वेश में सजाया और उसके साथ जा कर बनावटी नम्रता से उन ऋषियों के चरणों में प्रणाम करके प्रश्न किया, ब्राह्मणों! यह सुंदरी गर्भवती है और आपसे एक प्रश्न पूछना चाहती है, परंतु स्वयं पूछने में संकोच करती है। आप लोगों का ज्ञान अमोघ है, आप सर्वज्ञ हैं। इसे पुत्र की बड़ी लालसा है और अब इसका प्रसव-काल निकट है। आप लोग बताइए कि यह कन्या जनेगी या पुत्र?
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परीक्षित!
जब उन कुमारों ने इस प्रकार उन ऋषि-मुनियों को धोखा देना चाहा, तब वे भगवत् प्रेरणा से वे क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा,
मूर्खों! यह एक ऐसा मूसल पैदा करेगी जो तुम्हारे कुल का नाश करने वाला होगा।
मुनियों की यह बात सुनकर वे बालक बहुत ही डर गये। उन्होंने तुरंत साम्ब का पेट खोलकर देखा तो सचमुच उसमें एक लोहे का मूसल मिला...
...अब वे पछताने लगे और कहने लगे-
हम बड़े अभागे हैं।
देखो! हम लोगों ने यह क्या अनर्थ कर डाला?
अब लोग हमें क्या कहेंगे?
इस प्रकार वे घबराए हुए मूसल लेकर अपने निवास स्थान में गये।
उनके चेहरे फीके पड़ कर कुम्हला गये थे।
उन्होंने भरी सभा में, सभी यादवों के सामने, वह मूसल ले जाकर रख दिया और महाराज उग्रसेन से सारी घटना कह सुनाई।
राजन् !
जब सभी ने ब्राह्मणों के श्राप की बात सुनी और अपनी आंखों से उस मुसल को देखा तब सभी द्वारकावासी विस्मित और भयभीत हो गए। क्योंकि वे जानते थे कि ब्राह्मणों का श्राप कभी झूठ नहीं होता।
यदुराज उग्रसेन के आदेश पर उस मूसल को चूरा-चूरा कर डाला गया और उस चूर्ण तथा लोहे के बचे हुए छोटे टुकड़े को समुद्र में फिंकवा दिया।
इस संबंध में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कोई सलाह नहीं ली।
परीक्षित!
मूसल के टुकडे को एक मछली निगल गई और उसका चूरा तरंगों के साथ बह कर समुद्र के किनारे आ लगा। वह थोड़े दिनों में बिना गांठ की एक घास जिसे एरक कहते हैं, के रूप में उग आया।
मछली मारने वाले मछुआरों ने समुद्र में दूसरी मछलियों के साथ उस मछली को भी पकड़ लिया जिसने मूसल का वह टुकड़ा निगला था।
उस मछली के पेट से जो मूसल के लोहे का टुकड़ा निगला उसे
जरा नामक व्याध ने अपने बाण की नोक में लगा लिया।
परीक्षित!
भगवान श्रीकृष्ण यह सभी कुछ जानते थे और वे इस श्राप को उलट भी सकते थे। परंतु उन्होनें ऐसा करना उचित नहीं समझा और ब्राह्मणों के उस श्राप का अनुमोदन ही किया।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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