सुदामा चरित-३ गुरु और गुरु की भूमिका

                                                         सुदामा चरित-३

 गुरु और गुरु की भूमिका


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ब्राह्मण मित्र(सुदामा) का सादर सत्कार करने के बाद द्वारकाधीश भगवान ने उन्हें अपने पलंग ही पर लिटा दिया और उनकी चरणसेवा की। रुक्मिणी जी चँवर डुला कर सेवा कर रही थी।
उनके कुछ देर विश्राम कर लेने के बाद दोनों मित्र बातें करने लगे।
वर्णाश्रम के तीन गुरु
ब्राह्मण देवता से भगवान श्रीकृष्ण ने कहा,
 मित्र!
इस संसार में शरीर का
कारण-जन्मदाता पिता ही उसका प्रथम गुरु है।
 इसके पश्चात 
उपनयन-संस्कार करके सत्कर्मों की शिक्षा देने वाला दूसरा गुरु है।
- वह मेरे ही समान पूज्य है। उसके पश्चात ज्ञानोपदेश देकर परमात्मा को प्राप्त कराने वाला गुरु तो मेरा स्वरुप ही है।
वर्णाश्रमियों के ये तीन गुरु होते हैं।
मेरे प्रिय मित्र!
गुरु के स्वरुप में स्वयं मैं ही हूं।
इस जगत में वर्णाश्रमियों में जो लोग अपने गुरुदेव के उपदेश के अनुसार, अनायास ही भवसागर पार कर लेते हैं, वे अपने स्वार्थ और परमार्थ के सच्चे जानकार हैं।
 प्रिय मित्र!
मैं सभी की आत्मा हूं।
सभी के हृदय में अंतर्यामी रुप से विराजमान हो मैं गृहस्थ के धर्म- 
पंच महायज्ञ आदि से, ब्रह्मचारी के धर्म-
उपनयन वेदाध्ययन आदि से, वानप्रस्थी के धर्म-
 तपस्या से 
और संन्यासी के धर्म-
सभी ओर से उपरत हो जाने,
इन सभी से, भी उतना संतुष्ट नहीं होता "जितना गुरुदेव की सेवा-शुश्रूषा से संतुष्ट होता हूं।
*
गुरुकुल की स्मृति
भगवान  श्रीकृष्ण ने पूछा, ब्रह्मन्! 
जिस समय हम लोग गुरुकुल में निवास कर रहे थे, उस समय की वह बात आपको याद है क्या?
एक दिन जब हम दोनों को,  हमारी गुरुपत्नी ने ईंधन (सूखी लकड़ियां) लाने के लिए जंगल में भेजा था? 
उस समय हम लोग एक घोर जंगल में गए हुए थे और बिना ऋतु के ही बड़ा भयंकर 
आंधी-पानी आ गया था! आकाश में बिजली कड़कने लगी थी, सूर्यास्त हो गया था और चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा फैल गया था।
 धरती पर इतना पानी हो गया था कि कहां गड्ढा है और कहां किनारा इसका भी पता नहीं चलता था।
 हम लोग एक दूसरे का हाथ पकड़ कर जंगल में इधर-उधर भटकते रहे...
...जब हमारे गुरुदेव सान्दीपनि मुनि को इस बात का पता चला, तब वे सूर्योदय होने पर हम लोगों को ढूंढ़ते हुए जंगल में पहुंचे और उन्होंने देखा कि हम अत्यंत आतुर हो रहे हैं।
 वे कहने लगे,
 आश्चर्य है, आश्चर्य है!
पुत्रों! तुम लोगों ने हमारे लिए अत्यंत कष्ट उठाया।
सभी प्राणियों को अपना ही शरीर सबसे अधिक प्रिय होता है, परंतु तुम दोनों ही उसकी परवाह न करके हमारी सेवा में ही संलग्न रहे। गुरु के ऋण से मुक्त होने के लिए सत्शिष्यों का इतना ही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध भाव से अपना सभी कुछ और शरीर भी गुरुदेव की सेवा में समर्पित कर दें।
 द्विज शिरोमणियों! मैं तुम लोगों से अत्यंत प्रसन्न हूं। तुम्हारे सारे मनोरथ, सारी अभिलाषाएं पूर्ण हों और तुम लोगों ने हमसे जो वेद-अध्यन किया है, वह तुम्हें सर्वदा कंठस्थ रहे तथा इस लोक एवं परलोक में कहीं भी वह निष्फल न हो। 
इसमें संदेह नहीं है कि गुरुदेव की कृपा से ही मनुष्य शांति का अधिकारी होता है और पूर्णता को प्राप्त करता है। 
*
तब ब्राह्मण देवता(सुदामा जी) ने कहा, 
देवताओं के आराध्य जगद्गुरु श्रीकृष्ण! 
भला अब हमारे लिए क्या करना बाकी है?
क्योंकि आपके साथ, जो स्वयं सत्यसंकल्प परमात्मा हैं, हमें गुरुकुल में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।आपका शरीर ही छन्दोमय वेद है। 
आप ही धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चतुर्विध पुरुषार्थ के मूल स्रोत हैं। और आप स्वयं वेदाध्ययन के लिए गुरुकुल में निवास करें? यह आपकी मनुष्य-लीला का अभिनय नहीं तो और क्या है?
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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