सुदामा चरित-४ भगवद्कृपा ,भगवान को भेंट




 सुदामा चरित-४

 भगवद्कृपा,भगवान को भेंट

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भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण देवता से कहा,

 मित्र!

किमुपायनमानीतं ब्रह्मन् मे भवता गृहात्।३।

भगवान श्री कृष्ण पूछते हैं-

हे ब्राह्मण देवता!

आप अपने घर से मेरे लिए क्या उपहार लाए हैं?

और आगे कहते हैं-

अण्वप्युपाहृतं भक्तै: प्रेम्ना भूर्येव मे भवेत्। भूर्यप्यभक्तोपहृतं न मे तोषाय कल्पते।।३।।

जब मेरे प्रेमी भक्त

प्रेम से थोड़ी सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते हैं तो वह मेरे लिए बहुत हो जाती है। परंतु मेरे जो भक्त नहीं हैं,

वे यदि बहुत-सी सामग्री भी मुझे भेंट करते हैं, तो उससे मैं संतुष्ट नहीं होता।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:।।४।।

(स्कं.१०/अ.८१)

जो पुरुष प्रेमभक्ति से

पत्ते, पुष्प, फल और जल 

में से कोई भी वस्तु मुझे समर्पित करता है,

तो मैं उस शुद्धचित्त भक्त का वह प्रेम उपहार केवल स्वीकार ही नहीं करता,

 तुरंत उस वस्तु का भोग लगा लेता हूं।

*

चार मुट्ठी चिवड़े

 परीक्षित! 

भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा करने पर भी उन ब्राम्हण देवता ने लज्जा और संकोचवश उन भगवान लक्ष्मीपति को 

"वे चार मुट्ठी चिवड़े" नहीं दिये।

उन्होंने संकुचित होकर अपना मुंह नीचे कर लिया।

 परीक्षित!

 समस्त प्राणियों के हृदय का एक- एक संकल्प और उनका अभाव भी जानने वाले भगवान्  उन ब्राह्मण देवता के आने का कारण जानते थे। उन्होंने यह विचार करके कि एक तो यह मेरा प्रिय मित्र है, और दूसरे, 

इसने पहले कभी लक्ष्मी की कामना से मेरा भजन नहीं किया है। 

इस समय, यहां अपनी पतिव्रता पत्नी को प्रसन्न करने के लिए ही, उसी के आग्रह से यहां आया है।

 अब मैं ऐसी संपत्ति दूंगा इसे जो देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है!

 भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसा विचार करके उसके वस्त्रों में से चीथड़े की एक पोटली में रखा हुआ चिवड़ा

यह क्या है? 

-ऐसा कहकर स्वयं छीन लिया और बड़े आदर पूर्वक बोले, 

प्यारे मित्र! यह तो तुम मेरे लिये अत्यंत प्रिय भेंट लाये हो। ये चिवड़े, न केवल मुझे, बल्कि सारे संसार को तृप्त करने के लिए पर्याप्त हैं। 

ऐसा कह कर वे उसमें से एक मुट्ठी चिवड़ा खा गये।

उन्होंने दूसरी मुट्ठी भरी... रुक्मिणीजी जो स्वयं भगवती लक्ष्मी हैं, ने भगवान श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया!

क्योंकि वे तो एकमात्र भगवान के परायण हैं,

वे उन्हें छोड़कर और कहीं जा नहीं सकतीं।

रुक्मिणीजी ने कहा,

 विश्वात्मन् ! बस-बस! मनुष्य को इस लोक में तथा मरने के बाद परलोक में भी... समस्त संपत्तियों की, समृद्धि प्राप्त करने के लिए यह एक मुट्ठी चिवड़ा ही बहुत है। क्योंकि आपके लिए इतना ही प्रसन्नता का हेतु बन जाता है।

शुकदेवजी ने कहा,

परीक्षित!

उस रात ब्राह्मण देवता भगवान श्रीकृष्ण के महल में ही रहे।

उन्हें ऐसा लगा मानो वे वैकुंठ में ही पहुंच गये हों।

 परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण ने उन ब्राह्मण को प्रत्यक्ष रुप में कुछ भी नहीं दिया,

फिर भी,

उन ब्राम्हण देवता ने भगवान से कुछ नहीं मांगा।

 वे अपने चित्त की करतूत पर कुछ लज्जित-से होकर भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन से उत्पन्न आनंद में डूबते-उतरते अपने घर की ओर चल पड़े। वे मन ही मन सोचने लगे-

 अहो! कितने आनंद और आश्चर्य की बात है? ब्राह्मणों को अपना इष्टदेव मानने वाले भगवान श्रीकृष्ण की ब्राम्हणभक्ति आज मैंने अपने आंखों से देख ली। धन्य है! जिनके वक्ष:स्थल पर स्वयं लक्ष्मीजी  सदा विराजमान रहती हैं, उस हृदय से उन्होंने मुझ दरिद्र को लगा लिया? मुझे अपना सगा भाई समझ कर उस शैय्या पर सुलाया  जिस पर उनकी प्राणप्रिया रुक्मिणी जी शयन करती हैं। मैं थका हुआ था, इसलिए, स्वयं उनकी पटरानी रुक्मिणीजी ने अपने हाथों चँवर डुला कर मेरी सेवा की।  देवताओं के आराध्य देव होकर भी प्रभु ने मेरे पांव दबा कर, मुझे अपने हाथों से खिला-पिला कर मेरी इतनी सेवा-शुश्रूषा की और  देवताओं की तरह मेरी पूजा की..."

अहा! परम दयालु श्रीकृष्ण ने मुझ पर कितनी कृपा की! मुझे तनिक भी धन नहीं दिया।

 यह सोचकर, कि कहीं

यह दरिद्र धन पाकर मतवाला न हो जाए और मुझे भूल न बैठे! यह सोचते हुए ब्राह्मण देवता अपने घर के पास आ पहुंचे।

ब्राह्मणदेव पर कृपा



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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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