सर्वदेवमय और सर्ववेदमय
सर्वदेवमय और सर्ववेदमय
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शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
विदेह की राजधानी मिथिला में एक गृहस्थ ब्राह्मण थे उनका नाम था श्रुतदेव
उन दिनों बहुलाश्व मिथिला-नरेश थे।
ये दोनों ही भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय भक्त थे।
श्रुतदेव गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी किसी प्रकार का उद्योग नहीं करते थे, जो कुछ मिल जाता उसी से अपना निर्वाह कर लेते थे।
उतने से ही वे परम संतुष्ट थे और अपने धर्म पालन में तत्पर रहा करते।
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एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने श्रुतदेव और बहुलाश्व दोनों पर प्रसन्न होकर द्वारका से विदेह की राजधानी मिथिला की ओर प्रस्थान किया।
उस समय भगवान के साथ मैं(शुकदेव)स्वयं और नारद, वामदेव, अत्रि, वेदव्यास, परशुराम, असित, आरुणि, बृहस्पति, कण्व, मैत्रेय, च्यवन आदि ऋषि भी थे।
(जिन्हें भगवान् ने "ब्राह्मण" संबंधित किया है।)
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द्वारका से मिथिला के मार्ग में काठियावाड़(आनर्त), धन्व, कुरुजांगल, कंक, मत्स्य, पांचाल, कुंति मधु, केकय, कोसल, अर्ण आदि अनेक देश पड़े।
भगवान और उनके संगी ऋषि-मुनि जिन मार्गों से और जिन देशों से होते हुए जा रहे थे वहां के नर-नारियों ने भगवान श्रीकृष्ण और उन ऋषि-मुनियों के दर्शन का लाभ प्राप्त किया जिससे उनकी अज्ञान-दृष्टि नष्ट हो गई।
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भगवान जब मिथिला पहुंचे तब उनके आगमन की बात सुनकर वहां के नागरिकों और ग्रामवासियों के आनंद की सीमा न रही।
वे अपने हाथों में विविध पूजन-सामग्रियां लेकर उनकी अगवानी करने उपस्थित हुए। मिथिला-नरेश बहुलाश्व और ब्राह्मण श्रुतदेव ने भगवान के चरणों पर गिरकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर
दोनों ने एक साथ ही भगवान को अपने घर आतिथ्य ग्रहण करने के लिए निमंत्रित किया। भगवान ने दोनों की ही प्रार्थना स्वीकार कर के पृथक-पृथक,
एक ही समय में,
दोनों के घर ऋषियों के साथ ही प्रवेश किया।
दोनों को ही यह बात नहीं पता थी, कि इसी समय भगवान, उनके अतिरिक्त और भी कहीं उपस्थित हैं। दोनों ने अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार भगवान और ऋषि-मुनियों का स्वागत सत्कार किया।
मिथिला-नरेश बहुलाश्व ने जहां सुंदर-सुंदर आसन देकर उन सभी की पूजा-अर्चना करके उन्हें भोजन परोसा...
...वहीं ब्राह्मण श्रुतदेव ने कुशासन और पीढ़े लगा कर कर अनायास उपलब्ध होने वाली सामग्रियों से उन सभी का सत्कार किया।
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मिथिलानरेश राजा बहुलाश्व ने भगवान श्रीकृष्ण और ऋषियों से मिथिला में रुक कर निमिवंश को पवित्र करने की प्रार्थना की, जिसे भगवान ने स्वीकार किया और मिथिलावासी नर-नारियों का कल्याण करते हुए कुछ दिनों तक वहीं रहे।
इधर ब्राह्मण श्रुतदेव की स्तुति से प्रसन्न होकर
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा,
प्रिय श्रुतदेव!
~ये बड़े-बड़े ऋषि-मुनि,
जो अपनी चरणधूलि से लोगों और लोकों को पवित्र करते हुए मेरे साथ विचरण कर रहे हैं;
तुम पर अनुग्रह करने के लिए ही यहां पधारे हैं।
~देवता पुण्य क्षेत्र और तीर्थ आदि दर्शन, स्पर्श और अर्चन आदि के द्वारा धीरे-धीरे बहुत दिनों में पवित्र करते हैं; परंतु संत पुरुष अपनी दृष्टिमात्र से सभी को पवित्र कर देते हैं।
~यही नहीं देवताओं में जो पवित्र करने की शक्ति है वह भी उन्हें संतों की दृष्टि से ही प्राप्त होती है।
~श्रुतदेव!
जगत में ये ऋषि/महत्तत्व को जानने वाले ब्राह्मण(ब्रह्म को जानने वाले) जन्म से ही सभी प्राणियों से श्रेष्ठ हैं। यदि वे तपस्या, विद्या, संतोष और मेरी उपासना- मेरी भक्ति से युक्त हों तब तो कहना ही क्या है?
~मुझे अपना यह चतुर्भुज रूप भी इन ब्रह्मज्ञों की अपेक्षा अधिक प्रिय नहीं है। क्योंकि "ये ब्रह्मज्ञ" सर्ववेदमय हैं
और "मैं"
सर्वदेवमय हूं।
~दुर्बुद्धि मनुष्य इस बात को न जान कर केवल मूर्ति आदि में ही पूज्यबुद्धि रखते हैं और गुणों में दोष निकालकर मेरे स्वरूप जगतगुरु ब्राह्मण का जो कि उनका आत्मा ही है, तिरस्कार करते हैं।
~ ब्रह्मज्ञ मेरा साक्षात्कार करके, अपने चित्त में यह निश्चय कर लेता है कि यह चराचर जगत,
इस जगत के संबंध की सारी भावनाएं और इसके कारण, प्रकृति, महत्-तत्व
सब के सब आत्म स्वरूप भगवान के ही रूप हैं...
...इसलिए श्रुतदेव!
तुम इन ब्राह्मणों को मेरा ही स्वरूप समझकर, पूरी श्रद्धा से इनकी पूजा करो!
यदि तुम ऐसा करोगे तब तो तुमने साक्षात् अनायास ही मेरा पूजन कर लिया।
नहीं तो बड़ी से बड़ी बहुमूल्य सामग्रियों से भी मेरी पूजा नहीं हो सकती।
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शुकदेव जी कहते हैं,
परीक्षित!
भगवान् श्रीकृष्ण का यह आदेश प्राप्त करके श्रुतदेव ने हुए भगवान श्रीकृष्ण और उनके साथ पधारे ब्राह्मणों की एकात्मभाव से आराधना की तथा उनकी कृपा से वे भगवत्स्वरूप को प्राप्त हो गए।
इधर राजा बहुलाश्व ने भी वही गति प्राप्त की।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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