बलराम चरित-३
बलराम चरित-३
तीर्थ-यात्रा
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भगवान् बलरामजी ब्राह्मणों के साथ कौशिकी नदी
(कुरुक्षेत्र की एक नदी/ गंगा की सहायक नदी) के तट पर आए वहां स्नान करके वे उस सरोवर पर गए जो
सरयू नदी(वर्तमान में भारत-नेपाल सीमा पर काली नदी का उद्गम) का उद्गम है।
वहां से वे बड़ी दूर तक सरयू के किनारे चलते-चलते जब वे गंगाजी के पास आ पहुंचे तब सरयू तट छोड़कर वे प्रयाग आ गए।
वहां उन्होंने स्नान करने के बाद देवताओं, ऋषियों एवं पितरों का तर्पण किया और पुलह आश्रम (काशी) पहुंचे।
वहां से गंडकी(नारायणी/गण्डक), गोमती(गंगा की सहायक नदी), विपाशा( ब्यास नदी) आदि पावन नदियों में स्नान करके वे सोन नद के तट पर पहुंचे और वहां स्नान किया।
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गया पहुंचकर, अपने पिता वसुदेव जी की आज्ञा के अनुसार पितरों के लिए पूजन-यजन किया।
तत्पश्चात् गया से बलरामजी गंगा-सागर-संगम पर पहुंचे। वहां स्नान एवं तीर्थ कर्मों से निवृत्त होकर परशुराम जी की तपस्या स्थली महेंद्र पर्वत(वर्तमान में उड़ीसा राज्य) पर गए और परशुराम जी का दर्शन और अभिवादन किया। महेंद्र पर्वत से सप्तगोदावरी(गौतमी, वशिष्ठा, कौशिकी, आत्रेयी, वृद्ध गौतमी, तुल्या और भारद्वाजी), वेणा(वेण्णा-महाराष्ट्र), पम्पा(पम्बा-केरल) और भीमरथी(भीमा नदी) आदि नदियों में स्नान करते हुए वे स्वामी कार्तिक के दर्शन करने गए और वहां से महादेवजी की निवास स्थान श्रीशैल पर पहुंचे।
श्रीशैल पर्वत से भगवान बलराम जी ने द्रविड़ देश के परमपुण्य वेंकटाचल (बालाजी) का दर्शन किया और फिर शिवकांची-कामाक्षी एवं विष्णुकांची होते हुए कावेरी(कर्णाटक) में स्नान करने के पश्चात पुण्यमय श्रीरंग क्षेत्र पहुंचे जहां भगवान विष्णु सदैव विराजित रहते हैं।
वहां से उन्होंने भगवान विष्णु के क्षेत्र ऋषभ पर्वत, दक्षिण मथुरा(मदुरै/मदुराई) तथा बड़े से बड़े महापाप नष्ट करने वाले सेतुबंध(रामेश्वरम) की यात्रा की।
सेतुबंध में ब्राह्मणों को गोदान करने के पश्चात बलरामजी कृतमाला (मदुरै/तमिलनाडु) और ताम्रपर्णी (अगस्त्यकूदम पर्वत, तमिलनाडु से निकलने वाली एक नदी) नदियों में स्नान करते हुए सात कुलपर्वतों में से एक "मलय पर्वत" जहां अगस्त्य मुनि विराजमान हैं, पर पहुंच कर बलरामजी ने मुनि को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद और अनुमति प्राप्त की।
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कृतमाला नदी में ही तर्पण करते हुए राजा सत्यव्रत को भगवान् विष्णु ने मत्स्य(मछली/मीन) रूप में दर्शन दिए और महाप्रलय में उनकी रक्षा की थी।
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तत्पश्चात उन्होंने दक्षिण समुद्र की यात्रा की। वहां उन्होंने दुर्गा देवी का कन्याकुमारी के रूप में दर्शन फाल्गुन तीर्थ के अनंत क्षेत्र में गए और वहां के सर्वश्रेष्ठ पंचाप्सर तीर्थ में स्थान किया जहां सर्वदा भगवान विष्णु का सान्निध्य रहता है।
यहां पर भी बलराम जी ने गोदान किया।
बलराम जी वहां से चलकर केरल और त्रिगर्त देश भ्रमण करते हुए भगवान् शंकर के क्षेत्र "गोकर्ण तीर्थ"(कर्णाटक) में पहुंचे जहां सदा-सर्वदा भगवान शंकर विद्यमान रहते हैं।
वहां से वे जल से घिरे द्वीप में निवास करने वाली
आर्या देवी का दर्शन करने गए और आगे बढ़ कर शूर्पारक क्षेत्र(सोपारा/थाणे/मुम्बई) की यात्रा की।
तत्पश्चात तापी(ताप्ती), पयोष्णी और निर्विन्ध्या(चम्बल की एक सहायक नदी/पार्वती नदी?) आदि नदियों में स्थान करके वे दण्डकारण्य में आए। दण्डकारण्य से वे नर्मदाजी के तट पर गए जिसके तट पर माहिष्मतीपुरी स्थित है। वहां मनु तीर्थ में स्नान करने के पश्चात् वे वापस अपने प्रभास क्षेत्र में चले आए।
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

Very Nice 👍
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जवाब देंहटाएंLove the details😁👌🏻🙌🏻
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