शिवजी और श्रीहरि

 

शिवजी और श्रीहरि

🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼


(आज का अंक साधकों को समर्पित है।)

राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से पूछा,

भगवन्!

भगवान शंकरजी ने समस्त लोकों का त्याग कर रखा है; परंतु जो देवता, असुर अथवा मनुष्य उनकी उपासना करते हैं, वे प्रायः धनवान और भोग-संपन्न हो जाते हैं?

वहीं भगवान विष्णु-  लक्ष्मीपति हैं, परंतु उनकी उपासना करने वाले प्रायः धनी और भोग-संपन्न नहीं होते!

दोनों प्रभु त्याग और भोग की दृष्टि से एक दूसरे से भिन्न स्वभाव वाले हैं,

परंतु उपासकों को उनके स्वरूप के विपरीत फल मिलता है?

 मुझे इस विषय में बड़ा संदेह है कि

त्यागी(शिवजी) की उपासना से भोग और

लक्ष्मीपति(श्रीहरि) की उपासना से त्याग

कैसे प्राप्त होता है?

*

शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

भगवान शिव सदा अपनी शक्ति से युक्त रहते हैं।

वे सत्य आदि गुणों से युक्त तथा अहंकार के अधिष्ठाता हैं अहंकार के तीन भेद हैं-

 वैकारिक, तैजस और तामस।

इन तीनों अहंकार से

सोलह विकार यथा,

दस इंद्रियां, पंच-महाभूत और एक मन।

इन सबके अधिष्ठाता देवताओं में से किसी एक की उपासना करने पर समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है।

*

 परंतु परीक्षित! भगवान् श्रीहरि प्रकृति से परे, स्वयं पुरुषोत्तम एवं प्राकृत गुणरहित हैं।

वे सर्वज्ञ हैं तथा सभी के अंतःकरण के साक्षी हैं।

अतः जो उनका भजन करता है वह स्वयं ही गुणातीत हो जाता है।

*

तुम्हारे दादा युधिष्ठिर ने जब अश्वमेध यज्ञ पूरा किया था; तब भगवान से विविध प्रकार के धर्मों के उपदेश प्राप्त करते समय, उन्होंने भी भगवान श्रीकृष्ण से यही प्रश्न पूछा था।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा,

था-

यस्याहमनुगृह्णामि हरिष्ये तद्धनं शनै:। ततोऽधनं तयजन्त्स्य स्वजना दु:खदु:खितम्।।८।।

(अध्याय ८८/स्कंध १०)

~राजन्! जिस पर मैं कृपा करता हूं, उसका सब धन धीरे-धीरे छीन लेता हूं।

जब वह निर्धन हो जाता है तब उसके सगे-संबंधी उसके दुखी चित्त की परवाह न करके उसे छोड़ देते हैं।

*

~इस पर वह धनप्राप्ति के लिए पुनः उद्योग करने लगता है, तब मैं उसका वह प्रयत्न भी निष्फल कर देता हूं।

...इस प्रकार बार-बार असफल होने के कारण जब धन कमाने से उसका मन विरक्त हो जाता है, उसे दुःख का कारण समझ कर वह उधर से अपना मुंह मोड़ लेता है

और मेरे प्रेमी भक्तों का आश्रय लेकर, उनका संग करता है, तब मैं उस पर अपनी अहैतुकी कृपा की वर्षा करता हूं।

*

~मेरी कृपा से उसे परमसुख- सूक्ष्म-अनंत-सच्चिदानंद- स्वरूप परब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।

...इस प्रकार, मेरी प्रसन्नता और मेरी आराधना बहुत ही कठिन है।

यही कारण है, कि साधारण लोग मुझे छोड़कर, मेरे ही अन्य रूपों में स्थित अन्य-अन्य देवताओं की आराधना करते हैं।

*

मेरे ही दूसरे रूप आशुतोष हैं, वे शीघ्र ही पिघल पड़ते हैं और अपने भक्तों को साम्राज्य-लक्ष्मी दे देते हैं। जिसे पाकर वे उच्छृंखल, प्रमादी और उन्मत्त हो जाते हैं और अपने वरदाता देवताओं को भी भूल जाते हैं तथा उनका तिरस्कार कर बैठते हैं।

(श्लोक-९, १० और ११)

*

 शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भगवान् के ये तीनों ही रूप श्राप और वरदान देने में समर्थ हैं। परंतु इनमें से

भगवान महादेव और ब्रह्माजी ही शीघ्र ही प्रसन्न अथवा रुष्ट होकर वरदान अथवा श्राप दे देते हैं। परंतु भगवान श्रीहरि (विष्णु) वैसे नहीं हैं।

🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

पौंड्रक वध

साधन-प्राश-३:अंतरिक्ष

साधन-प्राश-२:भगवद्भक्त(भागवत) के लक्षण