सुदामा चरित-१ (पुरोवाक्)




सुदामा चरित-१ पुरोवाक्

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भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में से एक प्रसिद्ध लीला द्वारकाधीश भगवान् श्रीकृष्ण और दरिद्र ब्राह्मण (जिसे सभी सुदामा के नाम से जानते हैं!) 

की मित्रता की लीला है। 

किंतु 

श्रीमद्भागवत महापुराण में सुदामा नामक एक ही चरित्र प्रस्तुत होता है, और वह है, 

मथुरा में कंस का माली। 

जिसने भगवान श्रीकृष्ण, बलरामजी और उनके समस्त बाल सखाओं को सुंदर पुष्प-मालाओं से सज्जित किया था।

भगवान ने उस 

"सुदामा माली" पर कृपा की थी।

जिस श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता की कथा हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, उस सुदामा को श्रीमद्भागवत की कथा में एक "दरिद्र ब्राह्मण" के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

उस कथा में कहीं भी भगवान के इस ब्राह्मण मित्र का नाम "सुदामा" नहीं लिखा है।

 अस्तु।

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आज

विषय प्रवेश के पूर्व हम यहां एक प्रसिद्ध भजन के पूर्वकथन के श्रोत की चर्चा करेंगे।

श्रीमद्भागवत के 

दसवें स्कंध के अध्याय-८० में राजा परीक्षित ने शुकदेवजी से प्रश्न किया है- 


भगवन् यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मन:। वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतमिच्छामहे प्रभो।।१।।


राजा परीक्षित शुकदेव जी से भगवान श्री कृष्ण की उन लीलाओं को सुनना चाहते हैं जो अबतक (शुकदेव जी) ने नहीं कही हैं।


को नु श्रुत्वा ब्रह्मन्...।।२।।

...ऐसा कौन होगा, जो भगवान उत्तमश्लोक (श्रीकृष्ण का ही एक नाम) की लीलाओं को सुनकर, उससे विमुख होना चाहेगा?


सा वाग् यया तस्य गुणान् गृणीते, करौ च तत्कर्मकरौ मनश्च। स्मरेद् वसन्तं स्थिरजंगमेषु, श्रुणोति तत्पुण्यकथा: स कर्ण:।।३।।


जो वाणी उस (श्याम/श्रीकृष्ण) के गुणों का गान करती है, वही सच्ची वाणी है।

वे ही सच्चे हाथ हैं, जो भगवान् की सेवा के लिए काम करते हैं।

वह मन ही सच्चा मन है, जो चराचर(स्थावर-जंगम) प्राणियों में निवास करने वाले भगवान का स्मरण(सुमिरन) करता है;

और वे कान ही वास्तव में कान कहलाने योग्य हैं, जो भगवान की पुण्यमयी कथाओं का श्रवण करते हैं।


शिरस्तु तस्योभयलिंगमानमेत्तदेव यत् पश्यति तद्धि चक्षु:। अंगानि विष्णोरथ तज्जनानां पादोदकं यानि भजन्ति नित्यम्।।४।।


वही सिर सिर है, जो चराचर जगत को भगवान् की चल-अचल प्रतिमा समझ कर नमस्कार करता है;

और जो सर्वत्र भगवद्-विग्रह का दर्शन करते हैं, वे नेत्र ही वास्तव में नेत्र हैं।

शरीर के जो अंग भगवान और उनके भक्तों के चरणोदक का सेवन करते हैं, वे अंग ही वास्तव में अंग हैं;

सच पूछिये तो उन्हीं का होना सफल है।

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स्क०-१०,अध्याय-८०

श्लोक क्रमांक ३ और ४ का प्रसिद्ध भजन रूप-


है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे,

है शीश जो प्रभु चरण में वंदन किया करे ।

बेकार वो मुख है जो रहे व्यर्थ बातों में,

मुख है वो जो हरि नाम का सुमिरन किया करे ॥

*

हीरे मोती से नहीं शोभा है हाथ की,

है हाथ जो भगवान् का पूजन किया करे ।

मर कर भी अमर नाम है उस जीव का जग में,

प्रभु प्रेम में बलिदान जो जीवन किया करे ॥

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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