देवताओं की भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
देवताओं की भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼
भगवान श्रीकृष्ण और उनकी लीलाएं देखने के लिए देवर्षि नारद समय-समय पर द्वारका में आते रहते थे।
ऐसे ही एक समय उन्होंने वसुदेवजी के अतिथि होकर उन्हें सत्संग में नौ योगीश्वरों द्वारा विदेहराज निमि को दिए गए धार्मिक उपदेशों का विवरण कह सुनाया था
(जो श्रीमद् भागवत के ग्यारहवें स्कंध के दूसरे अध्याय से पांचवे अध्याय तक "विदेहराज महाराज निमि को नौ योगीश्वरों द्वारा प्रदत्त धार्मिक उपदेश के रूप में उद्धृत हैं। किंतु वर्तमान विषय की निरंतरता को बनाए रखते हुए, हम इस विषय को बाद में लेंगे। अस्तु।)
*
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
जब देवर्षि नारद वसुदेवजी को उपदेश करके चले गए तब ब्रम्हाजी अपने पुत्रों- सनकादि देवताओं और प्रजापतियों के साथ, सर्वेश्वर महादेव शंकरजी भूतगणों के साथ और देवराज इंद्र मरुद्- गणों के साथ द्वारका में आए। उनके साथ ही साथ द्वादश आदित्य, अष्ट वसु, एकादश रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, ऋभु, अंगिरा के वंशज ऋषि, विश्वदेव, नाग, सिद्ध, गंधर्व, चारण, पितर, ऋषि, विद्याधर, अप्सराएं, किन्नर, गुह्यक भी द्वारका पहुंचे।
*
इन तैंतीस कोटि के देवताओं ने और उनके साथ पहुंचे सभी प्रतिनिधियों ने श्रद्धा पूर्वक भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की। तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने भगवान से कहा,
सर्वात्मन् प्रभु!
पहले हम लोगों ने आपसे अवतार लेकर पृथ्वी का भार उतारने की प्रार्थना की थी, सो वह काम आपने हमारी प्रार्थना के अनुसार ही यथोचित रूप से पूरा कर दिया।
साथ ही आपने सत्यपरायण साधु-पुरुषों के कल्याणार्थ धर्म की स्थापना भी कर दी और दसों दिशाओं में ऐसी कीर्ति फैला दी जिसे सुनने से लोगों के मन का मालिन्य दूर हो जाता है।
हे सर्वशक्तिमान प्रभु!
आपको यदुवंश में अवतार ग्रहण किए हुए अब
एक सौ पच्चीस वर्ष बीत चुके हैं;(श्लोक-२५/६/११) अब हमारा ऐसा कोई कार्य शेष नहीं है, जिसे पूर्ण करने के लिए आपको यहां पृथ्वी पर रहने की आवश्यकता हो!
ब्राह्मणों के श्राप के कारण आपका यह यदुकुल भी एक प्रकार से नष्ट हो ही चुका है? इसलिए हे वैकुण्ठनाथ!
यदि आप उचित समझें, तो अपने परमधाम में पधारिए और अपने सेवक
हम लोकपालों का तथा हमारे लोकों का पालन-पोषण कीजिए।
*
शुकदेव जी ने कहा,
परीक्षित!
जब भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी को यदुवंश का नाश होने के पश्चात शीघ्र ही स्वधाम पधारने का आश्वासन दिया, तब ब्रह्माजी और उनके साथ पधारे समस्त देवगण आदि, भगवान को प्रणाम कर के अपने-अपने लोकों को लौट गए।
"द्वारका से प्रभासक्षेत्र जाने की तैयारी"
ब्रह्मा आदि देवताओं के जाते ही द्वारकापुरी में बड़े-बड़े अपशकुन और उत्पात उठ खड़े हुए। उन्हें देखकर यदुवंशी बड़े-बूढ़े भगवान श्रीकृष्ण के पास आए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, "गुरुजनों! आजकल द्वारका में जिधर देखिए उधर ही बड़े-बड़े अपशकुन और उत्पात हो रहे हैं; आप लोग जानते ही हैं कि ब्राह्मणों ने हमारे वंश को ऐसा श्राप दिया है कि इसे टाल सकना बहुत ही कठिन है। मेरा ऐसा विचार है कि यदि हम लोग अपने प्राणों की रक्षा चाहते हों, तो हमें यहां नहीं रहना चाहिए।
अब विलंब करने की आवश्यकता नहीं है, हम लोग आज ही परम पवित्र प्रभास-क्षेत्र के लिए निकल पड़ें।
प्रभास क्षेत्र की महिमा बहुत प्रसिद्ध है।
एक समय, दक्ष प्रजापति के श्राप से चंद्रमा को राज्य-यक्ष्मा रोग ने ग्रस लिया था, उस समय उन्होंने प्रभास-क्षेत्र में जाकर स्नान किया और वे तत्क्षण उस पापजन्य रोग से छूट गए और साथ ही उन्हें कलाओं की अभिवृद्धि प्राप्त हो गई। हम लोग भी प्रभास-क्षेत्र में चलकर स्नान करेंगे, देवताओं एवं पितरों का तर्पण करेंगे और सत्पात्र ब्राह्मणों को भोजन कराएंगे, उन ब्राह्मणों को पूरी श्रद्धा के साथ दान-दक्षिणा देंगे...और इस प्रकार, उनके आशीर्वाद से अपने संकटों को वैसे ही पार कर जाएंगे जैसे कोई जहाज के द्वारा समुद्र पार कर जाता है।
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें