यदुकुल का संहार

 



यदुकुल का संहार

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शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

जब भगवान श्रीकृष्ण के बाल-सखा श्री उद्धव जी ने प्रभास-क्षेत्र जाने हेतु यदुवंशियों को अपने-अपने रथ और बैलगाड़ियों को तैयार करते देखा, तब वे भगवान श्रीकृष्ण के पास आए और उनसे बोले, भगवन्! हमने साथ-साथ रहते हुए अब तक जीवन व्यतीत किया है, इसलिए हम आपकी माया पर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेंगे हमें उसका भय नहीं है, किंतु आपके वियोग का भय है। इसलिए, हे भगवन्! आप तो कृपा करके, हमें अपने साथ ही ले चलिये...

(श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में अध्याय दस से अध्याय तीस तक भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव जी को  विभिन्न योगों का दृष्टांतों सहित उपदेश दिया गया है; जिनमें से अध्याय सात से नौ तक अवधूत उपाख्यान है जिन्हें हम बाद में लेंगे। अस्तु।)

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उद्धव जी को तपस्या हेतु भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बद्रिकाश्रम भेजना

साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण द्वारा तत्वज्ञान के उपदेश प्राप्त करने के उपरांत भी,

भगवान् के चिर-सखा- परमज्ञानी उद्धव जी,

भगवान के वियोग की कल्पना-मात्र से बार-बार विह्वल होकर, मूर्छित होने लगे।

... कुछ समय बाद, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की चरण-पादुका अपने सिर पर धारण कर लीं और बारम्बार भगवान के श्रीचरणों में प्रणाम करके उन्हीं की आज्ञानुसार बदरिका-आश्रम के लिए प्रस्थान किया।

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शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

भगवान के आदेशानुसार यदुवंशियों ने स्त्रियों, बच्चों और वृद्धजनों को द्वारका से शंखोद्धार क्षेत्र भेज दिया।

 और सभी यदुवंशी नौकाओं से समुद्र पार कर पश्चिम-वाहिनी सरस्वती नदी के समुद्र-संगम (समुद्र में जा मिलने के स्थल) प्रभास-क्षेत्र में जा पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने सभी तरह के मंगलकृत्य किए। तत्पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन  कराया और तरह-तरह की सुंदर दक्षिणा प्रदान की। तत्पश्चात् उन्होंने स्वयं मैरेयक नामक मदिरा का सेवन किया जिससे उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई...

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यादवकुल का नाश

 हे परीक्षित!

यह सब भगवान श्रीकृष्ण की ही माया का प्रभाव था!

उस समय मदिरा के मद से वे मूढ़ हो चुके थे और एक दूसरे पर क्रोधित होकर आक्रमण करने लगे...

प्रद्युम्न- साम्ब से, अक्रूर-भोज से, अनिरुद्ध-सात्यकि से, सुभद्र- संग्रामजित् से, भगवान श्रीकृष्ण के भाई- गद भगवान के ही गद नामक पुत्र के साथ, सुमित्र-सुरत के साथ, इसी प्रकार भाई-भाई, चाचा-भतीजे, पिता-पुत्र, नाना-नाती इत्यादि संबंधी और सुहृद यदुवंशी एक दूसरे पर प्राणघाती-प्रहार कर रहे थे।

मदिरा के नशे में दाशार्ह, वृष्णि, अंधक, भोज, सात्वत, मधु, अर्बुद, माथुर शूरसेन विसर्जन, कुकुर और कुंति आदि यदुवंश के लोग भी एक-दूसरे को अपने-अपने हथियारों से चोट पहुंचा रहे थे...

...जब उनके अस्त्र-शस्त्र  नष्ट-भ्रष्ट हो गए- तब उन्होंने समुद्र-तट पर उगी हुई एरक नामक घास उखाड़नी शुरू की...

परीक्षित! यह वही घास थी जो ऋषियों के श्राप से मूसल के चूर्ण से उत्पन्न हुई थी।

हे राजन्! यह घास यदुवंशियों के हाथों में आते ही कालरूपी वज्र के समान कठोर मुद्गर में परिणत हो जाती...

...अब वे यदुवंशी एरक घास के मुद्गर से ही एक दूसरे पर प्रहार करने लगे...

भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने उन्हें ऐसा करने से रोकने का प्रयत्न किया तब  वे यदुवंशी, भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी को ही मारने के उद्देश्य से उनकी ओर दौड़ पड़े।

इस पर भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने उसी घास के मुद्गर के द्वारा उन समस्त यदुवंशियों को मारकर पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतार दिया।

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परीक्षित!

इस भीषण कुल-विनाश के पश्चात,

भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि उनके बड़े भाई बलराम जी ने वहीं- समुद्र तट पर बैठ कर, अपनी आत्मा को आत्मस्वरूप में स्थित करके, अपना मनुष्य शरीर त्याग दिया है।

तब वे स्वयं, पीपल के वृक्ष के तले जाकर, पृथ्वी पर ही बैठ गये।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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