पौंड्रक वध

 



पौंड्रक वध

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भगवान शुकदेव ने राजा परीक्षित से कहा

हे राजन्,

द्वापर युग में काशी नगरी की पूर्व दिशा में करूष देश (चुनार) था।

यहां के राजा का नाम पौंड्रक था। जो अत्यंत, दंभी, लंपट, महत्वाकांक्षी और चापलूसों से सदैव घिरा रहने वाला था। इन चापलूसों ने उसे बताया कि आप ही कृष्ण वासुदेव हैं और जगत पूजनीय हैं।

तबसे वह पीतांबर पहनने लगा। उसने कौस्तुभमणि की जगह एक बड़ा सा चमकता रत्न धारण किया।

पौंड्रक ने स्वयं के मुकुट को मोर पंखों से सजाया और शंख एवं चक्र से सज्जित दो नकली हाथ लगाकर वह चतुर्भुज बन गया। अब... स्वयं को वह ईश्वर कहने लगा।

 

घमंड से भर कर भगवान श्रीकृष्ण को पत्र लिखकर पौंड्रक ने चेतावनी दी कि वे अपने आप को श्रीकृष्ण, वासुदेव या द्वारकाधीश कहना छोड़ दें।

शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करना छोड़ दें और कौस्तुभ मणि ना पहनें।

अन्यथा इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा। 

पौंड्रक का संदेश पाकर,

श्रीकृष्ण ने कहलवा भेजा कि हे पौंड्रक, मैंने तेरे अन्याय और अत्याचारों की कथा सुनी है। वसुदेवपुत्र होने से मैं वासुदेव हूं और बचपन से ही मेरे रंग के कारण बालसखाओं द्वारा मुझे कृष्ण उपनाम मिला है। मैं तो द्वारका का सेवक हूं...

किंतु अब...मेरी ओर से तुम्हें भी चेतावनी है कि तुम अपने आपको भगवान वासुदेव कहना छोड़ दो और अपनी प्रजा के कल्याण और राजकाज में मन लगाओ।यदि तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आते तो अपना सुदर्शनचक्र तो मैं अवश्य छोडूंगा वह भी तुम्हारे ऊपर।अपने दूत से यह समाचार पाकर पौंड्रक तो अत्यंत क्रोधित हो उठा।

वह अपनी दो अक्षौहिणी सेना लेकर अपने मित्र काशीराज के पास जा पहुंचा। काशीराज के पास तीन अक्षौहिणी सेना थी। काशीराज और पौंड्रक ने एकसाथ श्रीकृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा।

 

इस पर श्रीकृष्ण ने कहा- हे पौंड्रक, तुमने मेरी चेतावनी को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया। तुमने अपनी पुत्रतुल्य प्रजा पर अनेकों अत्याचार किए। तुम्हारे दुश्कर्मों में तुम्हारे मित्र काशीराज ने बराबर का साथ दिया है। अब...क्योंकि तुमने स्वयं मुझे युद्ध के लिए ललकारा है अतः मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा।

 

यह कह कर भगवान श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को लक्ष्य करके पौंड्रक, काशिराज एवं युद्ध के लिए उद्यत उनकी सेना पर छोड़ दिया।



भीषण गर्जना करतासुदर्शन चक्र प्रलयंकारी अग्नि उगलता हुआ शत्रुओं पर टूट पड़ा। क्षण भर में ही उसने पांच अक्षौहिणी सेना को मार दिया, कुरूष राज पौंड्रक और काशीराज भी मारे गए।

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