जरा-व्याध को आशीर्वाद 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼

 

जरा-व्याध को आशीर्वाद

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द्वारका से प्रभास क्षेत्र जाने से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव जी से कहा था- महाभाग्यवान उद्धव!

ब्रह्मा, शंकर और इन्द्र आदि लोकपाल अब यह चाहते हैं कि मैं उनके लोकों से होता हुआ अपने धाम को चला जाऊं क्योंकि पृथ्वी पर देवताओं का जितना काम करना था उसे मैं पूरा कर चुका हूं और इसी काम के लिए ब्रह्मा जी की प्रार्थना से मैं बलराम जी के साथ अवतीर्ण हुआ था।

यह यदुवंश, जो ब्राह्मणों के श्राप से भस्म हो चुका है, पारस्परिक फूट और युद्ध से नष्ट हो जाएगा।

आज के सातवें दिन समुद्र इस द्वारकापुरी को डुबो देगा।

प्यारे उद्धव! जिस क्षण मैं मृत्युलोक का परित्याग कर दूंगा, उसी क्षण इसके समस्त मंगल नष्ट हो जाएंगे और थोड़े ही दिनों में पृथ्वी पर कलयुग का बोल बाला हो जाएगा जब मैं इस पृथ्वीका त्यागकर दूं तब तुम इस पर मत रहना क्योंकि कलयुग में अधिकांश लोगों की रूचि अधर्म में ही होगी।

 अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बंधु-बांधवों का स्नेह-संबंध छोड़ दो और अनन्य प्रेम से मुझ में अपना मन लगाकर समदृष्टि से पृथ्वी में स्वच्छंद विचरण करो।

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शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित! जब भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव जी को इस प्रकार आदेश दिया, तब भगवान के परमप्रेमी उद्धव जी ने उन्हें प्रणाम करके तत्वज्ञान की प्राप्ति की इच्छा से प्रश्न किया।

*

उद्धव जी के प्रश्नोंके उत्तर में भगवान श्री कृष्ण ने राजा यदु और अवधूत दत्तात्रेय जी के संवाद की कथा कही। (जिन्हें हम बाद के अंकों में लेंगे। अस्तु।)

शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

बलराम जी ने समुद्र तट पर बैठकर एकाग्र चित से परमात्मा का चिंतन करते हुए जब आत्मा को आत्म स्वरुप में स्थिर करके मनुष्य शरीर का त्याग कर दिया तब भगवान एक पीपल के वृक्ष  की छांव में जाकर बैठ गये।

उस क्षण उनके शंख-चक्र, गदा आदि आयुध मूर्तिमान हो कर प्रभु की सेवा करने लगे।

उस समय भगवान ने अपनी दाहिनी जंघा पर बांया चरण रखा हुआ था- उनके लाल-लाल तलवे रक्तकमल के समान चमक रहे थे।

*

जरा-व्याध

शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

जरा नामक एक बहेलिया  था, जिसे मछली के पेट से मूसल के लोहे का टुकड़ा मिला था।

उसने उस लोहे के टुकड़े से अपने बाण की गाँसी( तीर का नुकीला भाग) बना ली थी।

मृगया के समय उसे दूर-से भगवान के चरण-कमल का लाल-लाल तलवा हिरण के मुख के समान जान पड़ा और उसने उसे लक्ष्य करके, अपने उसी बाण से बींध दिया।

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शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

जब जरा अपने आखेट(शिकार) के पास आया, तब उसने देखा-

अरे! ये तो चतुर्भुज-पुरुष हैं! परंतु अब तो वह अपराध कर चुका था, वह भय से कांपता हुआ भगवान श्रीकृष्ण के चरणों पर सिर रखकर धरती पर गिर पड़ा और अपने अपराध के लिए भगवान से क्षमा याचना करने लगा। भगवान ने कहा,

हे जरे!

तू डर मत, उठ-उठ!

तूने तो मेरे मन का ही काम किया है। जा मेरी आज्ञा से तू उस स्वर्ग में निवास कर जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानों को होती है। शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

भगवान श्रीकृष्ण तो अपनी इच्छा से शरीर धारण करते हैं, जब उन्होंने जरा व्याध को यह आदेश दिया, तब उसने भगवान श्रीकृष्ण की तीन बार परिक्रमा की, उन्हें प्रणाम किया और विमान पर सवार होकर स्वर्ग को चला गया।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।



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