भगवान का स्वधाम-गमन 🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼


 


भगवान का स्वधाम-गमन

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भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमल को हिरण का मुख समझकर, जिस

जरा नामक  व्याध ने अपने बाण से बींध दिया था, उसी जरा को भगवान ने स्वर्गलोक की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया और उसे दिव्य विमान में स्वर्ग के लिए लोक प्रस्थित किया।

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तभी भगवान श्रीकृष्ण का सारथी दारुक उन्हें ढूंढता हुआ,

तुलसी की गंध से युक्त वायु को सूंघते हुए,

उनकी उपस्थिति का अनुमान लगा कर, उस जगह आ पहुंचा जहां पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान श्रीकृष्ण आसन लगाए बैठे हुए थे।

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उन्हें देखकर दारुक के हृदय में प्रेम की बाढ़ आ गई और उसके नेत्रों से आंसूओं की धारा बने लगी।

वह भगवान के चरणों पर गिर पड़ा।

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दारुक को आदेश

शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

दारुक भगवान श्रीकृष्ण से वियोग का अपना दु:ख कह ही रहा था कि उसके देखते ही देखते भगवान का गरुड़ध्वज वाला रथ शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक इन चारों घोड़ों के साथ आकाश में उड़ गया। उस रथ के पीछे-पीछे भगवान के सभी दिव्य आयुध भी चले गए।

यह सब देख, दारुक के आश्चर्य की सीमा न रही।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने उससे कहा,

दारुक! तुम द्वारका चले जाओ और वहां जाकर उन द्वारका वासियों  से यदुवंशियों के पारस्परिक संहार, भैया बलराम जी की परमगति और मेरे स्वधाम-गमन की बात कहो।

उनसे कहना,

अब तुम लोगों को अपने परिवार के साथ द्वारका में नहीं रहना चाहिए। मेरे न रहने पर समुद्र उस नगरी को डुबो देगा अतः सभी लोग अपनी धन-संपत्ति, कुटुंबियों और मेरे माता-पिता को लेकर अर्जुन के संरक्षण में इंद्रप्रस्थ चले जाएं।

हे दारुक! तुम मेरे द्वारा दिए उपदेश- भागवत धर्म का आश्रय लेकर, ज्ञाननिष्ठ होकर, सभी की उपेक्षा करो तथा इस (प्रभासक्षेत्र के) पूरे दृश्य को, मेरी माया की सृष्टि समझकर शांत हो जाओ।

भगवान के आदेश से दारुक ने उनकी परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया और फिर उदास मन से वह द्वारका के लिए चल पड़ा।

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शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

दारुक के चले जाने पर सभी देवता, गंधर्व, सिद्ध, ऋषि-मुनि आदि भगवान श्रीकृष्ण के प्रस्थान को देखने के लिए उत्सुकता पूर्वक वहां आ पहुंचे।

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सर्वव्यापक भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रह्माजी और अपने विभूति स्वरुप देवताओं को देखकर अपनी आत्मा को स्वरूप में स्थित किया और अपने कमलनयन मूंद लिए।

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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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