भगवान के स्वधाम-गमन के पश्चात्

 



भगवान के स्वधाम-गमन के पश्चात्

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दारुक ने द्वारका पहुंचकर, वसुदेव जी तथा उग्रसेन के चरणों में गिरकर, उन्हें आँसुओं से भिगोने लगा। शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

कुछ क्षण बाद दारुक ने स्वयं को संभाल कर, भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार  यदुवंशियों के विनाश का पूरा विवरण उन को कह सुनाया।उसे सुनकर वे सभी बहुत ही दुखी हुए और शोक से मूर्च्छित हो गए।

भगवान श्रीकृष्ण के वियोग से विह्वल होकर वे उस स्थान पर पहुंचे जहां उनके भाई-बंधु निष्प्राण हो कर पड़े हुए थे।

देवकी, रोहिणी और वसुदेवजी आपने प्यारे पुत्र श्रीकृष्ण और बलराम को देख कर शोक की पीड़ा से अचेत हो गए। उन्होंने भगवत-विरह से व्याकुल होकर वहीं अपने प्राण छोड़ दिए।

 स्त्रियों ने अपने अपने पतियों के शव पहचान कर, उन्हें हृदय से लगा लिया।

वे अपने-अपने पतियों के साथ चिता पर बैठकर, भस्म हो गईं।

बलराम जी की पत्नियां उनके शरीर को, वसुदेव जी की पत्नियां उनके शरीर को और भगवान की पुत्र-वधुएं अपने-अपने पतियों के शरीरों को लेकर अग्नि में प्रवेश कर गईं।

भगवान श्रीकृष्ण की रुक्मिणी आदि पटरानियां, भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न होकर, अग्नि में प्रविष्ट हो गईं।

(श्लोक- १५ से २०)

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परीक्षित!

अर्जुन अपने प्रियतम और सखा भगवान श्रीकृष्ण के विरह से, पहले तो अत्यंत व्याकुल हो गए; फिर उन्होंने अपने मित्र के गीतोक्त-उपदेशों का स्मरण करके स्वयं को संभाला।

यदुवंशी मृत व्यक्तियों में, जिनको कोई पिण्ड देने वाला नहीं था, उन सभी का श्राद्ध अर्जुन ने क्रमशः विधि पूर्वक संपन्न करवाया।

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भगवान के रहने पर, समुद्र ने एक मात्रभगवान श्रीकृष्ण का निवास-स्थान छोड़कर, एक ही क्षण में सारी द्वारका डुबो दी।

 भगवान श्रीकृष्ण वहां अब भी सदा-सर्वदा निवास करते हैं। यथा,

नित्यं सन्निहितस्तत्र भगवान्  मधुसूदन: स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमंगलमंगलम्।।२४।।

(स्कंध-११/अध्याय- ३१)

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परीक्षित!

भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार अर्जुन ने मृतकों के पिण्ड दान से निवृत्त होकर, शेष यदुवंशी बच्चों, वृद्धों और स्त्रियों को लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर प्रस्थान किया।

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इंद्रप्रस्थ में उन्होंने अपने भाइयों को प्रभासक्षेत्र में

यदुवंशियों के संहार की बात कह सुनाई और अपने साथ लाए गए यदुवंशियों को यथायोग्य बसाया।

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शुकदेव जी ने कहा,

परीक्षित!

अनिरुद्ध के पुत्र वज्र का राज्याभिषेक करने के पश्चात् पाण्डवों ने तुम्हारा राज्याभिषेक किया और वे सभी  हिमालय की वीरयात्रा को निकल पड़े।

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नमो भगवते वासुदेवाय।

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