"साधन-प्राश" वसुदेव-नारद संवाद
"साधन-प्राश"
वसुदेव-नारद संवाद
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भगवत्-धर्म
नारदजी और वसुदेवजी के मध्य जो संवाद हुआ वह श्रीमद्भागवत में
महाराज निमि और नौ योगीश्वरों के संवाद के अंतर्गत आया है।(अध्याय-२ से ५, स्कंध-११)
अस्तु।
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इस बार जब नारद जी द्वारका में पधारे और वसुदेव जी के अतिथि हुए तब नारदजी से वसुदेवजी ने कहा-
भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान्। छायेव कर्मसचिवा: साधवो दीन वत्सला:।।
(श्लोक-६/अध्याय-२/स्कंध-११)
(दृष्टव्य- श्रीभगवान उवाच
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।। गीता-४/११।।)
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जो लोग देवताओं का जिस प्रकार भजन करते हैं, देवता भी परछाई की तरह ठीक उसी रीति से भजन करने वालों को फल देते हैं; क्योंकि देवता कर्म के मंत्री हैं, अधीन हैं। परंतु सत्पुरुष दीन वत्सल होते हैं अर्थात् जो सांसारिक संपत्ति एवं साधन से भी हीन हैं, उन्हें अपनाते हैं।
हे देवर्षि!(नारदजी)
देवताओं के चरित्र भी कभी प्राणियों के लिए दु:ख के कारण तो कभी सुख दु:ख के कारण बन जाते हैं।
परंतु जो आप जैसे भगवत्-प्रेमी पुरुष हैं, उनकी प्रत्येक चेष्टा समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु होती है।
हे ब्रह्मन्!
अपने पूर्व जन्म में मैंने मुक्ति के प्रदाता भगवान् श्रीहरि की आराधना तो की थी, परंतु मुक्ति के लिए नहीं...
...मेरी आराधना का उद्देश्य था कि वे(ईश्वर) मुझे पुत्र के रूप में प्राप्त हों!
... उस समय मैं भगवान की लीला से मुग्ध हो रहा था।
हे सुव्रत!
अब आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे मैं इस जन्म-मृत्यु रुपी भयावह संसार
(जिसमें दु:ख भी सुख का विचित्र और मोहक रूप धारण कर के सामने आते हैं)
से, अनायास ही पार हो जाऊं।
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नारदजी ने कहा,
यदुवंश शिरोमणि!
तुम्हारा यह निश्चय बहुत ही सुन्दर है क्योंकि यह भागवत धर्म के संबंध में है, जो सारे विश्व को जीवनदान देने वाला और पवित्र करने वाला है।
वसुदेव जी!
भागवत धर्म एक ऐसी वस्तु है, जिसे कानों से सुनने, वाणी से उच्चारण करने, चित्त से स्मरण करने, हृदय से स्वीकार करने से मनुष्य उसी क्षण पवित्र हो जाता है- फिर चाहे वह भगवान् का द्रोही हो या सारे संसार का ही द्रोही क्यों न हो?
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ऋषभदेव के नौ योगीश्वर पुत्र और महात्मा विदुर
विषय-प्रवेश
स्वायंभुव मनु के एक प्रसिद्ध पुत्र प्रियव्रत हुए, जिनके पुत्र का नाम था आग्नीध्र।
आग्नीध्र के पुत्र नाभि और नाभि के पुत्र हुए ऋषभ।
ऋषभदेव को वासुदेव का अंश कहा गया है।
ऋषभदेव के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे राजर्षि भरत
जिन्होंने इस समूची पृथ्वी पर राज्य भोग किया और
जिनके नाम से यह देश जो पहले अजनाभवर्ष कहलाता था, भारतवर्ष कहलाया।
ऋषभदेव के शेष निन्यानबे पुत्रों में से नौ पृथ्वी के नौ द्वीपों के अधिपति हुए और इक्यासी पुत्र कर्मकाण्ड के रचयिता ब्राह्मण हो गये।
शेष नौ पुत्र संन्यासी हो गये जिनके नाम हैं- कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन।
नारदजी ने वसुदेव जी से कहा,
एक बार इसी अजनाभवर्ष (भारत) में विदेहराज निमि ने एक बहुत ही बड़े यज्ञ का आयोजन किया था। ये भगवान के परमप्रेमी और सूर्य के समान तेजस्वी "नौ योगीश्वर" समूची पृथ्वी पर स्वच्छंद विचरण करते हुए, महाराज निमि के यज्ञ में जा पहुंचे।
महाराज निमि और यज्ञस्थल में उपस्थित सभी ऋत्विज आदि ब्राह्मणों ने खड़े होकर
सभी नौ योगीश्वरों का स्वागत सत्कार किया और उन्हें यथोचित आसन प्रदान किया।
महाराज निमि ने उन नौ योगीश्वरों से धर्म संबंधी जो प्रश्न किये, उनके उत्तर एक-एक करके उन योगीश्वरों द्वारा दिए गए।
(साधकों के लिए हम इन प्रश्नोत्तरों को क्रमशः अगले अंक से आरंभ कर रहे हैं।)
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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